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तुलू-ए-इश्क़ के मंज़र थमे थे  - Diya Jeem

तुलू-ए-इश्क़ के मंज़र थमे थे
कहीं कासे कहीं पर सर थमे थे

नज़र दहशत-ज़दा यूँही नहीं थी
ख़यालों में बहुत से डर थमे थे

बरसना था जिन्हें आँखों से मेरी
वही बादल कहीं ऊपर थमे थे

दिल-ए-मुज़्तर तड़पने लग गया था
अजब तूफ़ान साँसों पर थमे थे

तुम्हारी राह के पत्थर थे जितने
हमारे पाँव में आ कर थमे थे

कई आसेब यादों के 'दिया' जी
हमारी रूह के अंदर थमे थे

Diya Jeem
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