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दीवारों से कान लगा कर बैठे हो  - Dr. Rakesh Joshi

दीवारों से कान लगा कर बैठे हो
पहरे पर दरबान लगा कर बैठे हो

इस से ज़ियादा क्या बेचोगे दुनिया को
सारा तो सामान लगा कर बैठे हो

दुख में डूबी आवाज़ें न सुन पाए
ऐसा भी क्या ध्यान लगा कर बैठे हो

बेच रहा हूँ मैं तो अपने कुछ सपने
तुम तो संविधान लगा कर बैठे हो

हम ने तो गिन डाले हैं टूटे वा'दे
तुम केवल अनुमान लगा कर बैठे हो

अपने घर के दरवाज़े की तख़्ती पर
अपनी झूटी शान लगा कर बैठे हो

ख़ूब अंधेरे में डूबे इन लोगों से
सूरज का अरमान लगा कर बैठे हो

जूझ रही है कठिन सवालों से दुनिया
तुम अब भी आसान लगा कर बैठे हो

कितने अच्छे हो तुम अपने बाहर से
अच्छा सा इंसान लगा कर बैठे हो

Dr. Rakesh Joshi
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