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ख़ंजर को ख़ंजर कहना है  - Dr. Rakesh Joshi

ख़ंजर को ख़ंजर कहना है
ऐसा अब अक्सर कहना है

सहमे सहमे डरे हुए हो
डर को भी अब डर कहना है

शीशों के इस शहर में आ कर
पत्थर को पत्थर कहना है

खेतों में हल ले कर निकलो
बंजर को बंजर कहना है

जंगल में तुम सब को जा कर
बंदर को बंदर कहना है

सर्दी के ही मौसम में तो
बे-घर को बे-घर कहना है

अजब चलन है नए शहर का
ज़ालिम को भी सर कहना है

Dr. Rakesh Joshi
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