बताना ही था सब कुछ फिर ये पूछा क्यूँ
जताना ही था इतना साथ छूटा क्यूँ
अगर शक ही नहीं तो झूठ सच बोली
फिदा था मैं मुझे तू रोज़ लूटा क्यूँ
बहाने मत बना ऐसे तू अपने से
ग़लत फहमी थी तो माफ़ी से रूठा क्यूँ
वफा के नाम पर अच्छी दगा दे दी
गई भी तू मगर ख़ुश मैं भी उतना क्यूँ
मोहब्बत में कभी डूबी नहीं तू
हा बस इतना बताने से तू गूंगा क्यूँ
— Devraj Sahu















