मैं ने तो बेहद ख़ास महबूबा बनाया था कभी

जो भी बनाया था मगर वो भी पराया था कभी

जिस के बिना अब चैन पड़ता भी नहीं है गुफ़्तुगू
हर ख़्वाब में भी तो उसे बुन के सजाया था कभी

वैसे यूँ ही चलते गुजरते एक दिन टकरा गया
मैं तो नहीं दिल तुझ से टकरा दिल लगाया था कभी

जुर्रत करी थी मैं ने तो अब आज बातो बात थी
हा गर हसाया भी था उस ने तो रुलाया था कभी

झूठा वो दुनिया जो हमें अच्छे नजर से देखती
हा तंग भी करती कभी जनता बताया था कभी

पागल ही होते है वो जो जज़्बात को करते छुपा
ये 'देव' भी तो ख़ुद जलाया औ' मिटाया था कभी

— Devraj Sahu

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Nazar Shayari

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