हम दोनों में राब्ता सोचती है
दुनिया भी कितना जुदा सोचती है
मैं ने तो उस को मोहब्बत ही दी है
सारा ही कुछ दे चुका सोचती है
कब से दु'आओं में महबूब माँगा
अब मिल रहा है तो क्या सोचती है?
ज़्यादास ज़्यादा भी कितना टिकेगी
वो सोच जो बस नफ़ा सोचती है
जा 'हुक्म' तेरी मोहब्बत पे लानत
वो लड़की ख़ुद को फँसा सोचती है
— Hukm















