लाज़िम ही रोती होंगी वो सारी ग़ज़लें
इन बहरों की ख़ातिर मुझ से बिछड़ी ग़ज़लें
इस दिल से लड़कर तुझ से पीछे हटता मैं
और उस पर ये तेरी जानिब बढ़ती ग़ज़लें
कितना अच्छा होता गर तू शाइरा होती
तू भी हाफ़ी को सुनती और कहती ग़ज़लें
हाए वो पांच फीट और तीन इंच की लड़की
जितनी छोटी ग़ज़लें उतनी प्यारी ग़ज़लें
आज वो प्यार का पहला ख़त सुनती देखी है
शुक्र ख़ुदा का ये लड़की भी समझी ग़ज़लें
हम को ख़ुद उम्मीद नहीं थी ख़ुद से जाना
हम ग़ज़लें लिक्खेंगे वो भी ऐसी ग़ज़लें
— Hukm














