मुझ से तुम रखो न वास्ता ज़रा अजीब हूँ

कुछ सुना मैं ने कहा है क्या ज़रा अजीब हूँ

प्यार ज़िंदगी सदीक़ घर ये अपने जो भी थे
मैं ने है ये सब दिया गँवा ज़रा अजीब हूँ

मैं नहीं हूँ अच्छा मैं नहीं किसी के काम का
बस इसी लिए हैं सब ख़फ़ा ज़रा अजीब हूँ

अपना जिस ने भी कहा सभी को अपना समझा पर
मैं ने था ये सब ग़लत किया ज़रा अजीब हूँ

मैं कई दफ़ा तो ख़ौफ़ ख़ुद से ही खा जाता हूँ
या ख़ुदा मुझे हुआ है क्या ज़रा अजीब हूँ

हर किसी ने ये किया सवाल क्या है यार तू
हर किसी को बस यही कहा ज़रा अजीब हूँ

— Shubham Burmen

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Khuda Shayari

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