ज़िंदगी बस जीना ही समझा सभी ने
इन दुखों को शा'इरी समझा सभी ने
दर्द में था मुस्कुराया आदतन मैं
इस हँसी को भी हँसी समझा सभी ने
बात थी कुछ और ही फिर भी न जाने
बात को कुछ और ही समझा सभी ने
मैं ने रो रो कर कहा तकलीफ़ में हूँ
चीख़ को भी खा़मुशी समझा सभी ने
मैं न जाने मर गया अंदर से कब का
देख तन को ज़िंदा ही समझा सभी ने
— Shubham Burmen















