रू-ब-रू उन के कोई हर्फ़ अदा क्या करते

दर्द तो हम को छुपाना था सदा क्या करते

बे-वफ़ाई भी वफ़ा ही की तरह की उस ने
ऐसे इंसान से करते तो गिला क्या करते

छिन गईं हाथ उठाने से दुआएँ महँगी
हौसला फिर वो दु'आओं का भला क्या करते

कुछ तो आते रहे उम्मीद के झोंके वर्ना
इतना शादाब मुझे आब ओ हवा क्या करते

अपने मेआ'र से गिरना नहीं आया हम को
अपने किरदार को हम इस से सिवा क्या करते

जब भी आया कोई अच्छा ही ख़याल आया है
'अश्क' हम जैसे ज़माने का बुरा क्या करते

— Ibrahim Ashk

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