ye nahin hai ki mujhe teri nazar yaad nahinus ne kya mujh se kaha tha ye magar yaad nahin | ये नहीं है कि मुझे तेरी नज़र याद नहीं

  - Ijtiba Rizvi

ये नहीं है कि मुझे तेरी नज़र याद नहीं
उस ने क्या मुझ से कहा था ये मगर याद नहीं

बे-नियाज़ी ये नहीं गुम-शुदगी है ऐ दोस्त
कि मुझे रब्त-ए-क़दीम-ए-दर-ओ-सर याद नहीं

वही शोर-ए-अरिनी और वही बेबाकी-ए-शौक़
कि मोहब्बत को अगर और मगर याद नहीं

दिल-ए-ख़ुद-काम है आसूदा-ए-ऐश-ए-मंज़़िल
उसे दिल-सोज़ी-ए-यारान-ए-सफ़र याद नहीं

हाए ये गुम-शुदगी रूह की तक़दीर में थी
आज पूछो कि कहाँ घर है तो घर याद नहीं

दीदनी है ये सरासीमगी-ए-दीदा-ए-शौक़
कि तिरे दर पे खड़े हैं तिरा दर याद नहीं

ज़िंदगी क्या है फ़क़त एक जुनून-ए-रफ़्तार
कि सफ़र में हैं मगर वज्ह-ए-सफ़र याद नहीं

फिर वही शौक़ की बेबाक-ख़िरामी 'रिज़वी'
सख़्तियाँ राह की ऐ मर्द-ए-सफ़र याद नहीं

  - Ijtiba Rizvi

Love Shayari

Our suggestion based on your choice

    इश्क़ का था खेल केवल दौड़ का
    बन के बल्लेबाज़ शामिल हो गया
    Divy Kamaldhwaj
    34 Likes
    यूँ तो रुस्वाई ज़हर है लेकिन
    इश्क़ में जान इसी से पड़ती है
    Fahmi Badayuni
    66 Likes
    'असद' ये शर्त नहीं है कोई मुहब्बत में
    कि जिससे प्यार करो उसकी आरज़ू भी करो
    Subhan Asad
    30 Likes
    मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
    मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
    Mirza Athar Zia
    20 Likes
    दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
    हर रस्म-ए-मोहब्बत को मिटाने के लिए आ
    Hasrat Jaipuri
    23 Likes
    भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
    मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है
    Munawwar Rana
    49 Likes
    बहुत आसान है कहना, बुरा क्या है भला क्या है
    करोगे इश्क तब मालूम होगा, मस'अला क्या है
    Bhaskar Shukla
    45 Likes
    सँभलने के लिए कर ली मुहब्बत
    मगर इसमें फिसलना चाहिए था
    Divy Kamaldhwaj
    हर किसी से ही मुहब्बत माँगता है
    दिल तो अब सबसे अक़ीदत माँगता है

    सीख आया है सलीक़ा ग़ुफ़्तगू का
    मुझसे मेरा दोस्त इज्ज़त माँगता है
    Read Full
    नई नस्लें समझ पाएँ मुहब्बत के मआनी
    हमें इस वास्ते भी शाइरी करनी पड़ेगी
    Dipendra Singh 'Raaz'
    31 Likes

More by Ijtiba Rizvi

As you were reading Shayari by Ijtiba Rizvi

    होश-ओ-ख़िरद में आग लगा दी ख़िरमन-ए-कैफ़-ओ-कम को जलाया
    शो'ला बने और सीने से लिपटे आप जले और हम को जलाया

    जिस को कहें घर-फूँक तमाशा बस वो तमाशा आप ने देखा
    आप की बिजली ख़ुश है कि उस ने मुश्त-ए-ख़स-ए-आदम को जलाया

    ग़ैर को झिड़की हम पे इनायत हो गई आख़िर जान को आफ़त
    बज़्म-ए-अज़ल में तुम ने बुला कर किस लिए ना-महरम को जलाया

    ज़िंदगी अपनी यास-ओ-तमन्ना आग पे आग और शो'ले पे शो'ला
    दिल को हमारे ग़म से जला कर शो'ला-ए-रुख़ से ग़म को जलाया

    कैसी जलन थी कैसी जलन है जल चुके फिर भी जल नहीं चुकते
    काश कोई यूँ तुम को जला दे जैसे कि तुम ने हम को जलाया

    आग है बिजली आग हैं ज़र्रे आग है सूरज आग हैं तारे
    हम ने न की थी शोख़-निगाही आप ने क्यों आलम को जलाया
    Read Full
    Ijtiba Rizvi
    घुप अंधेरा है क्या क़यामत है
    इक तबस्सुम की फिर ज़रूरत है

    सर को सीने पे रख के सुन लीजे
    आप से दिल को कुछ शिकायत है

    नासेहों से है मय-कशी का फ़रोग़
    शौक़ पर्वर्दा-ए-मलामत है

    दिल की धड़कन जो है मदार-ए-हयात
    इक ज़रा तेज़ हो तो आफ़त है

    आग पानी से भाप उठती रही
    हम समझते रहे मोहब्बत है

    दहर में हम कमाल-ए-सनअ'त हैं
    और बाक़ी फ़रेब-ए-सनअ'त है

    ज़ुल्फ़ बिखरा दो दोनों आलम पर
    कि अँधेरे की फिर ज़रूरत है

    अभी जीने का हुक्म है 'रिज़वी'
    और क्या जाने क्या मुसीबत है
    Read Full
    Ijtiba Rizvi
    ओछी थी नज़र ही जब तो भला अरमान-ए-तमाशा क्या करते
    ज़र्रे के जिगर तक जा न सके हम हिम्मत-ए-सहरा क्या करते

    रात उस ने नक़ाब उल्टी जो ज़रा सब बंद तअ'य्युन टूट गए
    वो वो न रहा हम हम न रहे ऐ शौक़-ए-तमाशा क्या करते

    बे-कैफ़ हमारा जीना था बे-मय का साग़र पीना था
    उस दिल में तमन्ना ही न उगी हम तर्क-ए-तमन्ना क्या करते

    तुम ने ही चमन को लूट लिया तुम ने ही नशेमन फूँक दिया
    हम शुक्र की हिम्मत कर न सके शर्मा गए शिकवा किया करते
    Read Full
    Ijtiba Rizvi
    और फिर कौन सी अब होगी मुलाक़ात की रात
    भीगी भीगी ये गुनहगार सी बरसात की रात

    घूमते कटता है कूचे में तिरे दिन का दिन
    बैठे कट जाती है चौखट पे तिरी रात की रात

    यूँ हैं बरहम तिरी घनघोर घटा सी ज़ुल्फ़ें
    जैसी बिखरी हुई बिफरी हुई ज़ुल्मात की रात

    ऐसी आबाद तिरी बज़्म है ऐ जान-ए-नशात
    जैसी काबा की सहर जैसी ख़राबात की रात
    Read Full
    Ijtiba Rizvi
    ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने
    ये घर आबाद होता इस को वीराँ कर दिया हम ने

    छुपोगे क्या दिगर रंग-ए-शबिस्ताँ कर दिया हम ने
    कि अपने घर को फूँका और चराग़ाँ कर दिया हम ने

    घुटे जाते थे तुम मीना-ए-क़ल्ब-ए-अहल-ए-ख़ल्वत में
    तुम्हें जाम-ए-कफ़-ए-सहरा-नशीनाँ कर दिया हम ने

    अनीस-ए-ख़्वाज्गाँ तुम थे जलीस-ए-ख़्वाज्गाँ तुम थे
    मगर तुम को नसीब कम-नसीबाँ कर दिया हम ने

    हरीम-ए-नाज़ से तुम को चुरा लाने के मुजरिम हैं
    ये सहरा था इसे भी कू-ए-जानाँ कर दिया हम ने

    नज़र वालो ज़रा चाक-ए-गरेबाँ देखते जाओ
    इसे चाक-ए-नक़ाब-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया हम ने

    ज़मीं ख़ाकिस्तर-ए-यक शोला-ओ-यम आब-ए-यक-गिर्या
    यही वो आब-ओ-गिल है जिस को इंसाँ कर दिया हम ने

    जफ़ा से फ़ितरत-ए-आसूदगाँ तामीर की तुम ने
    वफ़ा को क़िस्मत-ए-आशुफ़्ता-हालाँ कर दिया हम ने

    मता-ए-हुस्न महसूसात में अर्ज़ां ही रह जाती
    गिराँ उस को ब-यक तख़ईल-ए-यज़्दाँ कर दिया हम ने

    खंडर में माह-ए-कामिल का सँवरना इस को कहते हैं
    तुम उतरे दिल में जब दिल को बयाबाँ कर दिया हम ने

    अमानत माँगती थी हम से सामान-ए-निगह-दारी
    तुम्हीं को शहर-ए-ख़ामोशी का दरबाँ कर दिया हम ने
    Read Full
    Ijtiba Rizvi

Similar Writers

our suggestion based on Ijtiba Rizvi

Similar Moods

As you were reading Love Shayari Shayari