Ijtiba Rizvi

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Ijtiba Rizvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ijtiba Rizvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने
ये घर आबाद होता इस को वीराँ कर दिया हम ने

छुपोगे क्या दिगर रंग-ए-शबिस्ताँ कर दिया हम ने
कि अपने घर को फूँका और चराग़ाँ कर दिया हम ने

घुटे जाते थे तुम मीना-ए-क़ल्ब-ए-अहल-ए-ख़ल्वत में
तुम्हें जाम-ए-कफ़-ए-सहरा-नशीनाँ कर दिया हम ने

अनीस-ए-ख़्वाज्गाँ तुम थे जलीस-ए-ख़्वाज्गाँ तुम थे
मगर तुम को नसीब कम-नसीबाँ कर दिया हम ने

हरीम-ए-नाज़ से तुम को चुरा लाने के मुजरिम हैं
ये सहरा था इसे भी कू-ए-जानाँ कर दिया हम ने

नज़र वालो ज़रा चाक-ए-गरेबाँ देखते जाओ
इसे चाक-ए-नक़ाब-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया हम ने

ज़मीं ख़ाकिस्तर-ए-यक शोला-ओ-यम आब-ए-यक-गिर्या
यही वो आब-ओ-गिल है जिस को इंसाँ कर दिया हम ने

जफ़ा से फ़ितरत-ए-आसूदगाँ तामीर की तुम ने
वफ़ा को क़िस्मत-ए-आशुफ़्ता-हालाँ कर दिया हम ने

मता-ए-हुस्न महसूसात में अर्ज़ां ही रह जाती
गिराँ उस को ब-यक तख़ईल-ए-यज़्दाँ कर दिया हम ने

खंडर में माह-ए-कामिल का सँवरना इस को कहते हैं
तुम उतरे दिल में जब दिल को बयाबाँ कर दिया हम ने

अमानत माँगती थी हम से सामान-ए-निगह-दारी
तुम्हीं को शहर-ए-ख़ामोशी का दरबाँ कर दिया हम ने
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Ijtiba Rizvi
ये नहीं है कि मुझे तेरी नज़र याद नहीं
उस ने क्या मुझ से कहा था ये मगर याद नहीं

बे-नियाज़ी ये नहीं गुम-शुदगी है ऐ दोस्त
कि मुझे रब्त-ए-क़दीम-ए-दर-ओ-सर याद नहीं

वही शोर-ए-अरिनी और वही बेबाकी-ए-शौक़
कि मोहब्बत को अगर और मगर याद नहीं

दिल-ए-ख़ुद-काम है आसूदा-ए-ऐश-ए-मंज़़िल
उसे दिल-सोज़ी-ए-यारान-ए-सफ़र याद नहीं

हाए ये गुम-शुदगी रूह की तक़दीर में थी
आज पूछो कि कहाँ घर है तो घर याद नहीं

दीदनी है ये सरासीमगी-ए-दीदा-ए-शौक़
कि तिरे दर पे खड़े हैं तिरा दर याद नहीं

ज़िंदगी क्या है फ़क़त एक जुनून-ए-रफ़्तार
कि सफ़र में हैं मगर वज्ह-ए-सफ़र याद नहीं

फिर वही शौक़ की बेबाक-ख़िरामी 'रिज़वी'
सख़्तियाँ राह की ऐ मर्द-ए-सफ़र याद नहीं
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Ijtiba Rizvi
ताब ज़र्रे हैं अगर हो तो वही दिल हो जाए
आम जल्वा है तिरा जो मुतहम्मिल हो जाए

तेरा हर शो'बदा ऐ हुस्न हक़ीक़त ठहरे
हम कोई नक़्श बना लें तो वो बातिल हो जाए

लाख बे-बाक निगाहों से निगाहें लड़ जाएँ
एक सहमी सी नज़र हो तो वो क़ातिल हो जाए

डूबना शर्त-ए-सफ़र है मुझे ऐ शोरिश-ए-बहर
वर्ना गिर्दाब को दूँ हुक्म तो साहिल हो जाए

तुझ को क़ुदरत है कि हर ज़र्रे को इक दिल कर दे
मुझ को हसरत है कि जो दिल है मिरा दिल हो जाए

अपनी तस्वीर-ए-मजाज़ी कोई रख दो कि कहीं
कारवान-ए-निगह-ए-शौक़ को मंज़िल हो जाए

हिम्मत-ए-इश्क़ कि है हुस्न की फ़ितरत का ये राज़
सौ को बिस्मिल करे और एक का बिस्मिल हो जाए

आज तक तक न सके दिल कोई अपने क़ाबिल
तुम कि पत्थर को जो ताको तो वही दिल हो जाए

हैफ़ अपने सफ़र-ए-शौक़ की क़िस्मत 'रिज़वी'
पाँव थक जाएँ जहाँ बस वहीं मंज़िल हो जाए
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Ijtiba Rizvi
अहबाब छुटे महबूब छुटे घर छूट गया दर छूट गया
जब दिल से तमन्ना छूट गई सब रिश्ता नाता टूट गया

ऐ साक़ी-ए-बज़्म-ए-कैफ़-ए-हयात अब मुझ को प्यासा जाने दे
मय जिस में मिरी तक़दीर की थी वो शीशा तुझ से टूट गया

गो शीशा-गर-ए-क़ुदरत ने बहुत टूटे हुए शीशे जोड़ दिए
लेकिन ये हमारा शीशा-ए-दिल जोड़ा न गया यूँ टूट गया

इस साज़ पे नग़्मा अब छेड़ो तो नाला पैदा होता है
मौजूद हैं वो सब तार जो थे बस एक नहीं है टूट गया

हम रोते हैं अपने प्यारों को और फ़ितरत हम से कहती है
अब और खिलौनों से खेलो जो टूट गया सो टूट गया

वो राह में है आँखों में है दम ऐ बाद-ए-सबा आहिस्ता गुज़र
हैं तार-ए-नफ़स पर हचकोले अब टूट गया अब टूट गया

कहते हो कि माँगो जो माँगो बतलाओ तुम्ही हम क्या माँगें
चाहा था कि माँगें तुम से तुम्हें ये हो न सका जी छूट गया

हाँ सुन कि तुझे थी हम से ग़रज़ मोहताज-ए-नज़र था हुस्न तिरा
रक्खी रही शान-ए-इस्तिग़ना आख़िर को ये भांडा फूट गया

ये दिल तो वही दिल है 'रिज़वी' आबाद भी था वीरान भी है
अरमानों की इस बस्ती को कल एक मुसाफ़िर लूट गया
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Ijtiba Rizvi
जल्वों से न आँख झपकती है जल्वों को न आँख तरसती है
हम ने वो पियाला पी ही लिया जिस में न ख़ुमार न मस्ती है

कुछ लम्हे हैं जिन लम्हों में एहसास उसे छू लेता है
आलम से उधर जो आलम है हस्ती से उधर जो हस्ती है

है रूह की हालत कुंदन की जितना ही तपेगी निखरेगी
ग़म एक कसौटी है जिस पर ये फ़ितरत हम को कसती है

हिकमत की भी खेती ग़र्क़ हुई हैरत का भी सहरा डूब चला
घनघोर घटा है याद उन की क्या टूट के दिल पे बरसती है

हर सैर में थी इक बात मगर क्या अब के सफ़र की बात कहें
हम उस बस्ती में जा निकले हस्ती से परे जो बस्ती है

इस दिल से हो कर दिल से उधर इक बस्ती है जिस बस्ती में
हर जिंस की नायाबी है मगर इक जिंस-ए-तमाशा सस्ती है
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Ijtiba Rizvi
भीगी भीगी घटाएँ उठीं धीमी धीमी फुवारें आईं
रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जागी चुपके चुपके बहारें आईं

ज़िक्र-ओ-फ़िक्र में कुछ दिन झूले होश नहीं अब हैं वो झकोले
आगे रिम-झिम रिम-झिम बूँदें और पीछे बौछारें आईं

आलम-ए-शौक़ से उन का क़ैदी तौक़-ओ-सलासिल पहने आया
काँपे अर्श के पाए जब ज़ंजीरों की झंकारें आईं

मुद्दत से सैलाब बने वो बुनियादों को खोद रहे थे
टूटने पर अब दैर-ए-ख़ुदी की पथरीली दीवारें आईं

दोनों जहाँ की सारी पूँजी बार हुई है जिन नाक़ों पर
मर्द-ए-गदा के हाथ में क्यूँकर उन नाक़ों की महारें आईं

तेरे फ़क़ीर को रस्ता चलते इज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत में उलझाने
मंदिर से पूजाएँ दौड़ीं मस्जिद से फटकारें आईं

गोश-ए-अर्श का बोसा लेने दहर से उठ कर बारी बारी
काफ़िर की फ़रियादें आईं ग़ाज़ी की ललकारें आईं

उस की अपनी फ़ितरत जीती मेरे गुनाह पे रहमत बरसी
जैसे माँ की छाती उमडी जैसे दूध की धारें आईं
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Ijtiba Rizvi
पहुँच नहीं तो मोहब्बत का हौसला क्या है
ख़ुदा के पूजने वाले बता ख़ुदा क्या है

तलब की ज़िल्लत-ओ-बेचारगी मआ'ज़-अल्लाह
मिरी ख़ुदी का तशन्नुज है ये दुआ क्या है

हम उठ खड़े हुए दुनिया से झाड़ कर दामन
कि इन बुझे हुए ज़र्रात में धरा क्या है

रवा है क्या तिरी दुनिया में नारवा क्या है
मुझे बता कि ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है

ये इत्तिहाद-ए-तबीअ'त ये इख़्तिलाफ़-ए-मिज़ाज
ये तुर्फ़ा-कारी-ए-रफ़्तार-ए-इर्तिक़ा क्या है

ख़ुदा-फ़रोशी-ए-ज़ुहहाद-ए-सज्दा-कोश है क्या
ख़ुदा-फ़रामुशी-ए-रिंद-ए-कज-अदा क्या है

ख़राश-ए-आरज़ू-ए-क़ल्ब-ए-बादशह है क्या
सुकून-ए-ख़ातिर-ए-आसूदा-ए-गदा क्या है

हयात जिस को कहें इक जुनून-ए-गर्म-रवी
ये क्यों है इस की ग़रज़ इस का मुद्दआ' क्या है

कहाँ है अव्वल-ए-अव्वल कहाँ अख़ीर-ए-अख़ीर
नुमूद-ए-बे-सर-ओ-पा का ये सिलसिला क्या है

दिमाग़ में ये तजस्सुस कहाँ से आया है
ये क्यों है क्यों कोई बतलाए और ये क्या क्या है
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Ijtiba Rizvi
नहीं ऐसा कि कभी शौक़ पर-अफ़्शाँ भी नहीं
दिल को था नाज़ कि वीराँ है सो वीराँ भी नहीं

क्यों हैं तूफ़ान की ज़द में हरम-ओ-दैर-ओ-कुनिश्त
इन मज़ारों पे तो मुद्दत से चराग़ाँ भी नहीं

किस ने इस अंजुमन-ए-शौक़ को ताराज किया
दिल गुज़रगाह-ए-ख़यालात-ए-परेशाँ भी नहीं

शौक़-ए-अफ़्सुर्दा का मुझ से न गिला कर कि मुझे
ए'तिबार-ए-करम-ए-जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ भी नहीं

जल्वा-आबाद-ए-तसव्वुर ब-अदाकारी-ए-शौक़
अब तो मरहून-ए-फ़ुसूँ-साज़ी-ए-जानाँ भी नहीं

काएनात अपनी हमें दे के भी फ़ारिग़ नहीं आप
हम तो कुछ मुद्दई-ए-वुसअ'त-ए-दामाँ भी नहीं

कभी इस सम्त को भी बहर-ए-तमाशा निकलो
दिल का हैरत-कदा ऐसा कोई वीराँ भी नहीं

हैरत-आबाद तमाशा में न ज़ुल्मत है न नूर
कोई पिन्हाँ भी नहीं है कोई उर्यां भी नहीं

कब से मयख़ाने में 'रिज़वी' नहीं आया है नज़र
इस ख़िज़ाँ-दोस्त को कुछ शर्म-ए-बहाराँ भी नहीं
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Ijtiba Rizvi
दो दिन की हँसी दो दिन की ख़ुशी अंजाम-ए-अमल रोना ही पड़ा
इक उम्र गँवाई जिस के लिए इक रोज़ उसे खोना ही पड़ा

हम और अलाएक़ से छूटें मुमकिन नहीं जब तक हम हम हैं
दरिया को ब-ईं आज़ाद-रवी ज़ंजीर-ब-पा होना ही पड़ा

बाज़ार में आ कर नादाँ दिल मंज़र के खिलौनों पर मचला
और पीर-ए-ख़िरद को काँधे पर अम्बार-ए-नज़र ढोना ही पड़ा

क्या जानिए आख़िर क्यों इतनी आज़ुर्दा रही होंटों से हँसी
क़िस्मत पे भी हँसना जब चाहा आई न हँसी रोना ही पड़ा

हम तुख़्म-ए-मोहब्बत जन्नत से सीने में चुरा कर ले आए
इस रेत में क्या उगता वो भला हाँ लाए थे बोना ही पड़ा

बेदार-दिली के मंसूबे हम क्या क्या बाँध के आए थे
दुनिया ने थपक कर लोरी दी नींद आ ही गई सोना ही पड़ा
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Ijtiba Rizvi
होश-ओ-ख़िरद में आग लगा दी ख़िरमन-ए-कैफ़-ओ-कम को जलाया
शो'ला बने और सीने से लिपटे आप जले और हम को जलाया

जिस को कहें घर-फूँक तमाशा बस वो तमाशा आप ने देखा
आप की बिजली ख़ुश है कि उस ने मुश्त-ए-ख़स-ए-आदम को जलाया

ग़ैर को झिड़की हम पे इनायत हो गई आख़िर जान को आफ़त
बज़्म-ए-अज़ल में तुम ने बुला कर किस लिए ना-महरम को जलाया

ज़िंदगी अपनी यास-ओ-तमन्ना आग पे आग और शो'ले पे शो'ला
दिल को हमारे ग़म से जला कर शो'ला-ए-रुख़ से ग़म को जलाया

कैसी जलन थी कैसी जलन है जल चुके फिर भी जल नहीं चुकते
काश कोई यूँ तुम को जला दे जैसे कि तुम ने हम को जलाया

आग है बिजली आग हैं ज़र्रे आग है सूरज आग हैं तारे
हम ने न की थी शोख़-निगाही आप ने क्यों आलम को जलाया
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Ijtiba Rizvi
हदें फैलीं नज़र की फिर भी कम-बीनी नहीं जाती
कि हर सूरत अभी एक आँख से देखी नहीं जाती

ज़मीन-ए-दिल बहुत कुछ नर्म कर दी बे-क़रारी ने
मगर हम हैं इसी एहसास की सख़्ती नहीं जाती

हयात-ए-जामा-ज़ेब और नौ-ब-नौ जामे मगर क्या है
कि इस बर्बाद-सामाँ की तुनुक-रख़ती नहीं जाती

तजल्ली बे-नक़ाब और कोर आँखें क्या क़यामत है
कि सूरज सामने है और सियह-बख़्ती नहीं जाती

मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा लिख कर मोअर्रिख़ ये भी लिखता है
ये इक रस्म-ए-कुहन थी अब कहीं बरती नहीं जाती

मैं क्या मुँह ले के आऊँ आप के आईना-ख़ाने में
ये सूरत ऐसी बिगड़ी है कि पहचानी नहीं जाती

तसव्वुर से भी आगे जुस्तुजू की राह जाती है
वहाँ की बात लेकिन फिर यहाँ लाई नहीं जाती

तकल्लुफ़-बर-तरफ़ रस्म-ए-मुरव्वत तह करो 'रिज़वी'
मोहब्बत आप होती है मोहब्बत की नहीं जाती
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