कभी ग़ज़लें कभी क़िस्से कभी कविता मैं लिखती हूँ
तसव्वुर में तुझे मिलने का हर ज़रिया मैं लिखती हूँ
नहीं है कम वो जो इक शख़्स घर में सख़्त सा रहता
पिता को इस लिए सब से घना साया मैं लिखती हूँ
तुझे माना सदा कृष्णा तुझी से प्रीत बाँधी है
रहूँ जो साथ तेरे ख़ुद को फिर राधा मैं लिखती हूँ
कफ़स में जिस्म की बस नफ़्स हरदम छटपटाती है
लगूँगी मैं तुझे ज़िंदा मगर मुर्दा मैं लिखती हूँ
मिले कोई जो जिस्मानी मुहब्बत में नहीं उलझे
भला मुमकिन कहाँ ये पल न जाने क्या मैं लिखती हूँ
न जाने कैसी फ़ितरत से 'प्रिया' रब ने नवाज़ा है
कि हर ठोकर से जो पहला सबक़ मिलता मैं लिखती हूँ
— Priya omar















