बा'द मरने के भी हम किधर जाएँगे
बन के ख़ुशबू फ़िज़ा में बिखर जाएँगे
जब तलक ज़िन्दा हैं काम आते रहें
फिर तो बस याद बन के गुज़र जाएँगे
याद जब भी करो मुस्कुरा के करो
अश्क सारे पलक पे ठहर जाएँगे
महफ़िलों में हो चर्चा हमारा कभी
इक ग़ज़ल बन के दिल में उतर जाएँगे
बन के झोंका हवा सा गुज़रना नहीं
नाम कर के ज़माने में मर जाएँगे
क्यूँ करें मौत का ग़म बताओ भला
एक दिन तो सभी रब के दर जाएँगे
इस सुख़न से ही ज़िन्दा रहेगी प्रिया
जब पढ़ेंगे सभी हम सँवर जाएँगे
— Priya omar















