dil shab-e-furqat sukoon ki justuju karta raha | दिल शब-ए-फ़ुर्क़त सुकूँ की जुस्तुजू करता रहा

  - Naaz Muradabadi
दिलशब-ए-फ़ुर्क़तसुकूँकीजुस्तुजूकरतारहा
रात-भरदीवार-ओ-दरसेगुफ़्तुगूकरतारहा
जोबहारोंकीचमनमेंआरज़ूकरतारहा
नज़्र-ए-रंग-ओ-बूख़ुदअपनाहीलहूकरतारहा
अपनीनज़रोंकोख़राब-ए-जुस्तुजूकरतारहा
जोमुसलसलइम्तियाज़-ए-रंग-ओ-बूकरतारहा
शीशा-ए-दिलजोनज़ाकतमेंगुहरसकमनहींइश्क़मेंकैसेसितमसहनेकीख़ूकरतारहा
आशिक़ीमेंउसकीनाकामीभीनाकामीनहीं
जोफ़नाहोकरभीतेरीजुस्तुजूकरतारहा
तेरीचश्म-ए-मस्तसेपीनेकेजोक़ाबिलथा
मय-कदेमेंख़्वाहिश-ए-जाम-ओ-सुबूकरतारहा
सोचनायेहैकिउसकेख़ून-ए-दिलकोक्याहुआ
जोक़फ़समेंआरज़ू-ए-रंग-ओ-बूकरतारहा
दिलनेजोश-ए-शौक़मेंकितनेहीसज्देकरलिए
दीदा-ए-तरख़ून-ए-दिलसेहीवुज़ूकरतारहा
जिसनेपैहमकोशिशेंकींअम्न-ए-आलमकेलिए
वोख़ुदअपनेहीचमनकोसुर्ख़-रूकरतारहा
वोसितमढातेरहेहरदिलपेऔरहरज़ख़्म-ए-दिल
शिकवा-ए-बेदादउन्हींकेरू-ब-रूकरतारहा
ऐसेदीवानेकोक्याचाक-ए-गरेबाँकीहोक़द्र
उम्र-भरजोचाक-ए-दामनहीरफ़ूकरतारहा
सारेआलमकोरही'नाज़'उसकीजुस्तुजू
अपनेजल्वोंकोअयाँवोकू-ब-कूकरतारहा
  - Naaz Muradabadi
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Zakhm Shayari

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