है ख़ार ख़ार जहाँ नर्म नर्म ख़ू रखियो
हथेलियों में गुलाबों के रंग-ओ-बू रखियो
गँवा न दीजियो सब शहर-ए-दिल-निगारां में
बचा के थोड़ी सी सहबा-ए-आरज़ू रखियो
वो लोग जो हैं तअ'स्सुब की तीरगी के असीर
जला के दिल का दिया उन के रू-ब-रू रखियो
परों से पीटती सर को चली गई बुलबुल
इलाही मेरे चमन की तू आबरू रखियो
कि रेज़ा-रेज़ा बिखर जाएगी तुम्हारी ज़ात
ज़माना संग है न आइने की ख़ू रखियो
जो कह रही हैं ग़ज़ल रंग-ए-'मीर' में 'नाहीद'
तो उस के रुत्बे की लिल्लाह आबरू रखियो
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