तुम्हारा ज़ौक़-ए-परस्तिश मुझे अज़ीज़ मगर
मैं इस ज़मीन की मिट्टी मुझे ख़ुदा न कहो
तुम्हारे साथ अगर दो-क़दम भी चल न सकूँ
तो ख़स्ता-पा हूँ मुझे मुजरिम-ए-वफ़ा न कहो
ये एक पल की धड़कती हयात भी है बहुत
तमाम-उम्र के इस रोग को बुरा न कहो
इस एक ख़ौफ़ से लब सी लिए तुम्हारे हुज़ूर
कि हर्फ़-ए-शौक़ को इज़हार-ए-मुद्दआ न कहो
ये बे-रुख़ी का गिला मुझ से पहले ख़ुद से करो
उसे निगाह का यक-तरफ़ा फ़ैसला न कहो
गुज़रते वक़्त के मरहम से भर न जाए कहीं
इस एक ज़ख़्म को चाहत की इंतिहा न कहो
मैं एक ज़िंदा हक़ीक़त हूँ एक पल ही सही
तुम्हारा अक्स हूँ तुम तो मुझे फ़ना न कहो
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