ऐसे ही लीजिए न अगर जान चाहिए

अब और कितना क़त्ल का सामान चाहिए

इन पत्थरों में मेरा गुज़ारा नहीं हुआ
पहचान के लिए नई चट्टान चाहिए

तेरी लजीज़ बातों से उक़ता गया है दिल
नइं बात चाहिए है नया कान चाहिए

मुझ को भी चाहिए है कोई दिल अज़ीज़ शख़्स
लेकिन वो पल दो पल का ही मेहमान चाहिए

मुझ को वो साथ ले ले तकल्लुफ़ किए बगै़र
जिस को भी कोई शख़्स परेशान चाहिए

— Abuzar kamaal

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