ज़िंदगी में अब मुझको कुछ मज़ा नहीं आता
एक भी मेरे हक़ में फ़ैसला नहीं आता
मुझको ये बताती है इस सड़क की ख़ामोशी
इस सड़क पे कोई भी क़ाफ़िला नहीं आता
चलते चलते आया हूँ उस जगह पे मैं यारों
जिस जगह नज़र कोई रास्ता नहीं आता
मुझको अपनी कमियों का कुछ पता नहीं चलता
सामने अगर मेरे आइना नहीं आता
याद वो अगर हमको यार अब नहीं करता
याद अब हमें भी वो बा-ख़ुदा नहीं आता
कर रहा हूँ मैं कोशिश इक ग़ज़ल सुनाने की
पर ग़ज़ल सुनाने का क़ायदा नहीं आता
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Rachit Sonkar
our suggestion based on Rachit Sonkar
As you were reading Manzil Shayari Shayari