सन्नाटा छा गया है शब-ए-ग़म की चाप पर

सूरज को था यक़ीन बहुत अपने-आप पर

वो साइक़ा मिज़ाज है मैं सर्द बर्फ़ सा
हैरत-ज़दा हैं लोग तमाम इस मिलाप पर

मैं हूँ फ़सुर्दा शाम की अफ़्सुर्दगी है और
धुँदला सा अक्स-ए-यार है यादों की भाप पर

मैं मंज़िलों की जुस्तुजू में था ब-रंग-ए-मौज
अब रक़्स कर रहा हूँ मोहब्बत की थाप पर

लाज़िम ये पेश-ख़ेमा-ए-आफ़ात है 'ख़याल'
बेजा जमा नहीं हैं परिंदे अलाप पर

— Rafique Khayal

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