Rafique Khayal

Rafique Khayal

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Rafique Khayal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rafique Khayal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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नर्म लहजे में तहम्मुल से ज़रा बात करो
फिर ब-सद-शौक़ सर-ए-आम मुझे मात करो

या निसार आज करो मुझ पे तमाम अपने हुनर
या नज़र-बंद मिरे सारे कमालात करो

मैं रिवायात से बाग़ी तो नहीं हूँ लेकिन
तुम से मुमकिन हो तो तब्दील-ए-ख़यालात करो

एक मुद्दत से मिरे दिल का नगर है वीराँ
आओ इस दश्त पे तुम फूलों की बरसात करो

फ़स्ल उजालों की सियह-बख़्त ज़मीं उगलेगी
ज़र-निगार अपने ज़रा कश्फ़-ओ-करामात करो

इस तरह मिल के बिछड़ना तो क़यामत होगा
मुश्तइल तुम न मिरी जाँ मिरे जज़्बात करो

बे-नियाज़ी तो मिला करती है दुनिया से 'ख़याल'
तुम किसी तौर न तज्दीद-ए-ग़म-ए-ज़ात करो
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Rafique Khayal
जब तिरी चाह में दामान-ए-जुनूँ चाक हुआ
फिर कहीं जा के मुझे इश्क़ का इदराक हुआ

यूँ तो इक जैसे नज़र आते हैं चेहरे लेकिन
कोई ख़ुश-ख़्वाब हुआ और कोई ग़मनाक हुआ

वरक़-जाँ पे लिखे मैं ने सहीफ़े दिल के
इस हवाले से भी मैं शो'ला-ए-बेबाक हुआ

कोई मर के भी ज़माने में अमर होता है
और कोई जीते हुए भी जसद-ए-ख़ाक हुआ

जिस की लहरों से जनम लेते हैं संदल से बदन
उस समुंदर का ब-सद शौक़ मैं पैराक हुआ

ऐ 'ख़याल' आइना-ए-हुस्न-ए-मुजस्सम की क़सम
ख़ाक पर बैठ के मैं साहब-ए-अफ़्लाक हुआ
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Rafique Khayal
है दिल में जुनूँ-ख़ेज़ परस्तिश का इरादा
ऐसे में मुनासिब नहीं रंजिश का इरादा

जलने को है तय्यार मता-ए-दिल-ओ-जाँ फिर
अफ़्सोस मगर सर्द है आतिश का इरादा

मिट्टी का घरौंदा बड़ी मुश्किल से बना है
ऐ काश बदल दे कोई बारिश का इरादा

यूँ खुल के सर-ए-आम न मिल मुझ से मिरे दोस्त
दुनिया में है ज़िंदा अभी साज़िश का इरादा

कश्कोल मोहब्बत की तलब फिर भड़क उट्ठी
देखा जो ब-ज़िद उस में नवाज़िश का इरादा

उस ने बड़ा मोहतात रवय्या रखा फिर भी
लहजे से झलकता रहा ख़्वाहिश का इरादा

उस दिल का इलाक़ा सही मेरे लिए ममनूअ'
बदला न ब-हर-हाल रिहाइश का इरादा

है म'अरका-आरा जो 'ख़याल' आज ब-ज़ाहिर
रखता है पस-ए-तैश गुज़ारिश का इरादा
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Rafique Khayal
हिसार-ए-ज़ात से बाहर न अपने घर में हैं
हम इस ज़मीं की तरह मुस्तक़िल सफ़र में हैं

भटक रहे हैं अँधेरे मुसाफ़िरों की तरह
उजाले महव-ए-सुकूँ दामन-ए-सहर में हैं

जिन्हें ख़बर ही नहीं शरह-ए-ज़िंदगी क्या है
वो मुजरिमों की तरह क़ैद अपने घर में हैं

तो ए'तिबार-ए-शब-ए-इंतिज़ार है जानाँ
तिरे फ़िराक़ के मौसम मिरी नज़र में हैं

जो बे-क़रार हैं उन को कहीं क़रार नहीं
नसीब वाले सितारों की रहगुज़र में हैं

'ख़याल' आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार है शायद
जो सुस्त-गाम थे वो लोग भी सफ़र में हैं
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Rafique Khayal
मोहब्बतों की मसाफ़त से कट के देखते क्या
मुसाफ़िर-ए-शब-ए-हिज्राँ पलट के देखते क्या

सुरूर-ए-इश्क़ में गुम हो गए थे हम दोनों
हवा-ए-दामन-ए-शब से लिपट के देखते क्या

तिलिस्म-ए-यार रग ओ पय में ढल रहा था, हम
नशात ओ ग़म के सहीफ़े उलट के देखते क्या

बहार-ए-नौ को जनम दे रही थी वस्ल की शब
हम आफ़ियत की रुतों में सिमट के देखते क्या

था सैल-ए-हसरत-ए-दिल दुश्मन-ए-हयात मगर
रह-ए-बक़ा भी उसी में थी हट के देखते क्या
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Rafique Khayal
कितना जाँ-सोज़ है मंज़र मिरी तन्हाई का
हौसला मुझ में नहीं अंजुमन-आराई का

मैं ने समझा था जिसे बाइस-ए-तस्कीन-ए-नज़र
उस ने सामान किया है मिरी रुस्वाई का

मेरी बातों में नया रंग कहाँ से आए
मेरे दिल में भी है इक ज़ख़्म शनासाई का

बात तो जब है कि जज़्बों से सदाक़त फूटे
यूँ तो दावा है हर इक शख़्स को सच्चाई का

रूह में जज़्बा-ए-उलफ़त को फ़ुज़ूँ पाता हूँ
जब ख़याल आता है मुझ को तिरी रानाई का

ऐ 'ख़याल' आतिश-ए-एहसास भड़क जाएगी
आप दावा न करें धूप में दानाई का
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Rafique Khayal
बुझती शम्अ की सूरत क्यूँ अफ़्सुर्दा खड़े हो खिड़की में
देखो शाम है किस दर्जा दिलकश इस धूप की वर्दी में

वहम-ओ-गुमाँ के सहराओं में फूल खिले तिरी यादों के
और चराग़ाँ दूर तिलक है साँसों की इस वादी में

क़हर-ओ-ग़ज़ब के मिम्बर पर हाथों में लिए कश्कोल-ए-वफ़ा
झाँक रहा था सूरज भी कल ग़ौर से एक सुराही में

दूर खड़ा हो कर मैं इस लिए पहरों देखता रहता हूँ
क़ैद बहुत सी यादें हैं मिरी इस वीरान हवेली में

तहों की प्यास भी सतह पर अब साफ़ दिखाई देती है
ढूँड रहे हैं जाने क्या ये बादल नीली छतरी में

एक है अंदेशा मुझ को कहीं मेरे मर जाने के ब'अद
बेच न दें मेरे घर वाले मिरी क़ीमती ग़ज़लें रद्दी में

रंग और ख़ुश्बू की मानिंद है मेरा सरापा भी साहिब
क़ैद रखेगा आख़िर कब तक वक़्त मुझे यूँ मुट्ठी में

बहर-ए-मोहब्बत के साहिल की सैर बहुत कर ली हम ने
आओ ज़रा अब हम भी देखें बैठ के प्यार की कश्ती में

हिर्स-ओ-हवस के सारे पुजारी एक जगह हैं आज जम'अ
वक़्त की शाख़ पे शायद कोई फूल खिला है जल्दी में
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Rafique Khayal
ख़ुद को पा-बस्ता-ए-ज़ंजीर किए जा चुप-चाप
ख़्वाब शर्मिंदा-ए-ताबीर किए जा चुप-चाप

ख़ामा-ए-रंज-ओ-अलम से रुख़-ए-कम-माएगी पर
नुसरत-ए-जावेदाँ तहरीर किए जा चुप-चाप

ये अमल बाइ'स-ए-तस्कीन-ए-जुनूँ भी होगा
जज़्बा-ए-इश्क़ की ता'मीर किए जा चुप-चाप

ग़म-ए-दौराँ की अज़िय्यत भी तो दिल सहता है
ग़म-ए-जानाँ को भी जागीर किए जा चुप-चाप

ज़ख़्म गहरे तो ब-ज़िद शौक़ मिरे करता रहा
उस मसीहाई की तदबीर किए जा चुप-चाप

मक़्सद-ए-ज़िंदगी खुलता ही चला जाएगा
अपने दिल में उसे तस्वीर किए जा चुप-चाप

शाइ'री से है 'ख़याल' उस को शग़फ़ शे'रों में
अपने जज़्बात को तस्ख़ीर किए जा चुप-चाप
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Rafique Khayal
मिस्ल-ए-बहिश्त-ए-ख़ुश-नुमा कौन-ओ-मकान में
इंसान मुब्तला है अजीब इम्तिहान में

बुझती नहीं है कोशिश-ए-दरिया के बावजूद
ये कैसी तिश्नगी है मिरे जिस्म ओ जान में

वो धूप में खड़ा है बड़े इत्मिनान से
लौ दे रहा है मेरा बदन साएबान में

क्यूँ नाम इंतिसाब में लिख्खा गया मिरा
किरदार जब नहीं था मिरा दास्तान में

इस बार पस्तियाँ भी मयस्सर न आएँगी
शल हो गए जो बाल-ओ-पर ऊँची उड़ान में

वाबस्ता तुझ से अज़मत-ए-शेअर-ओ-सुख़न हुई
इस बात को भी रखना 'ख़याल' अपने ध्यान में
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Rafique Khayal
इतनी फ़ुर्सत नहीं उस पैकर-ए-पिंदार के पास
बन के आए वो मसीहा किसी बीमार के पास

गर यूँही वहशतें रक़्साँ रहीं दालानों में
कोई साया न रहेगा किसी दीवार के पास

रोज़ आँखों को नया तर्ज़-ए-सुख़न मिलता है
रोज़ जाता हूँ किसी यार-ए-तरह-दार के पास

फ़स्ल-ए-ग़म देख के नम-दीदा हुआ चर्ख़-ए-फ़लक
शायद आँखें ही नहीं आइना-बरदार के पास

मेरी दीवानगी ख़्वाबों से बग़ल-गीर हुई
दश्त आबाद किया जब किसी गुलज़ार के पास

रंग-ओ-निकहत के ख़ज़ाने भी ज़मीं-बोस हुए
चल के ख़ुद आने लगी ख़ुश्बू ख़रीदार के पास

ऐ 'ख़याल' अपने इरादों को तवाना रक्खो
मुफ़्लिसी आती नहीं है किसी फ़नकार के पास
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Rafique Khayal
ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी
मैं ढूँड लूँगा हर ख़ुशी चराग़ के बग़ैर भी

हुआ था जिस जगह कभी विसाल-ए-यार दोस्तो
है उस जगह पे रौशनी चराग़ के बग़ैर भी

लिक्खी गई हैं जिस के साथ ज़िंदगी की मंज़िलें
वो आ मिलेगा आदमी चराग़ के बग़ैर भी

मसर्रतों के क़ाफ़िले लुटा रही है फिर मुझे
तिरी ये ख़ुद-सुपुर्दगी चराग़ के बग़ैर भी

मैं तज़्किरा करूँ तो क्या करूँ जमाल-ए-यार का
दमक रही थी दिलकशी चराग़ के बग़ैर भी

तुम्हारी एक याद बे-शुमार हसरतों के रंग
निगाह में सजा गई चराग़ के बग़ैर भी

गिला किसी से क्यूँ करूँ गुज़र ही जाएगी 'ख़याल'
ये मुख़्तसर सी ज़िंदगी चराग़ के बग़ैर भी
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Rafique Khayal
उदास शाम की तन्हाइयों में जलता हुआ
वो काश आए कभी मेरे पास चलता हुआ

शब-ए-फ़िराक़ ने मिस्मार सारे ख़्वाब किए
कोई तो मुज़्दा सुनाए ये दिन निकलता हुआ

है क्या अजब कि कभी चाँद भी अँधेरों में
सुकूँ तलाश करे ज़ाविए बदलता हुआ

मिरे मसीहा ख़ुदा आज तेरा रक्खे भरम
नज़र मुझे नहीं आता ये जी बहलता हुआ

मैं रौशनी के नगर में पड़ाव ख़ाक करूँ
डरा रहा है मुझे अपना साया ढलता हुआ
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Rafique Khayal
ये सच है बहम उस की मोहब्बत भी नहीं थी
और तर्क मरासिम हों ये हिम्मत भी नहीं थी

उस शख़्स की उल्फ़त में गिरफ़्तार ये दिल था
जिस शख़्स को छूने की इजाज़त भी नहीं थी

कुछ ज़ख़्म-ए-तमन्ना को न था शौक़-ए-मुदावा
कुछ उस को मसीहाई की आदत भी नहीं थी

थे राह-ए-मोहब्बत में पड़ाव कई लाज़िम
क्या कीजिए रुकना मिरी फ़ितरत भी नहीं थी

जो ख़्वाब-ए-शिकस्ता को अता हौसला करती
हासिल वो जुनूँ-ख़ेज़ रिफ़ाक़त भी नहीं थी

हर-चंद कि अफ़्सोस बिछड़ने का हमें था
लेकिन मिलें हम फिर कभी हसरत भी नहीं थी

वहशत में चराग़ाँ में तिरे क़ुर्ब से करता
अफ़्सोस मयस्सर ये सुहूलत भी नहीं थी

कुछ रास्ते दुश्वार मनाज़िल के थे और कुछ
जज़्बों में 'ख़याल' अपने सदाक़त भी नहीं थी
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Rafique Khayal
दस्तरस में नहीं हालात तुझे क्या मा'लूम
अब ज़रूरी है मुलाक़ात तुझे क्या मा'लूम

रात के पिछले पहर नींद-शिकन तन्हाई
कैसे करती है सवालात तुझे क्या मा'लूम

तू ब-ज़िद है कि सर-ए-आम परस्तिश हो तिरी
मैं हूँ पाबंद-ए-रिवायात तुझे क्या मा'लूम

जश्न सावन का यूँ बढ़-चढ़ के मनाने वाले
ज़ुल्म क्या ढाती है बरसात तुझे क्या मा'लूम

शाना-ए-वक़्त पे अब ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरह
बिखरी रहती है मिरी ज़ात तुझे क्या मा'लूम

सिलसिला-वार दहकते हैं सहर होने तक
सर-ए-मिज़्गाँ मरे जज़्बात तुझे क्या मा'लूम

सादा बातें थीं 'ख़याल' उस की मगर उन में कई
चुप थे रंगीन ख़यालात तुझे क्या मा'लूम
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Rafique Khayal
रक़्स-ए-नैरंगी है नज़्ज़ारों के बीच
जी रहा हूँ शोबदा-कारों के बीच

एक दुनिया को है लुट जाने का डर
एक हम हैं लुट गए यारों के बीच

शिकवा-ए-जौर-ओ-जफ़ा किस से करूँ
प्यार से महरूम हूँ प्यारों के बीच

मुल्क-ओ-मिल्लत क़ौम-ओ-मज़हब दोस्तो
क्या नहीं बिकता ख़रीदारों के बीच

अज़्मत-ए-हव्वा का इक और आइना
हो गया नीलाम बाज़ारों के बीच

अस्ल रिश्ता तो ज़मीं से है मिरा
याद आया मुझ को सय्यारों के बीच

शौक़-ए-ख़ुद-आराई के हाथों हुआ
इक हयूला क़ैद दीवारों के बीच

या-इलाही रहम करना आज वो
आ गए चल के तलब-गारों के बीच

मेरे दम से ही हुई है रौशनी
दश्त-ओ-सहरा और कोहसारों के बीच

ऐ बहार-ए-अब्र-ए-नौ जल्दी बरस
जल रहे हैं ख़्वाब अँगारों के बीच

मुझ में है मौजूद पर्वाज़-ए-'ख़याल'
मो'तबर हूँ मैं भी फ़नकारों के बीच
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Rafique Khayal
सन्नाटा छा गया है शब-ए-ग़म की चाप पर
सूरज को था यक़ीन बहुत अपने-आप पर

वो साइक़ा मिज़ाज है मैं सर्द बर्फ़ सा
हैरत-ज़दा हैं लोग तमाम इस मिलाप पर

मैं हूँ फ़सुर्दा शाम की अफ़्सुर्दगी है और
धुँदला सा अक्स-ए-यार है यादों की भाप पर

मैं मंज़िलों की जुस्तुजू में था ब-रंग-ए-मौज
अब रक़्स कर रहा हूँ मोहब्बत की थाप पर

लाज़िम ये पेश-ख़ेमा-ए-आफ़ात है 'ख़याल'
बेजा जमा नहीं हैं परिंदे अलाप पर
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Rafique Khayal
तहलील मौसमों में कर के अजब नशा सा
फैला हुआ है हर-सू कुछ दिन से रत-जगा सा

मिलते हैं रोज़ उन से हसरत की सरहदों पर
रहता है फिर भी हाइल क्यूँ जाने फ़ासला सा

बरसों के सब मरासिम तोड़े हैं उस ने ऐसे
पल भर में टूट जाए जिस तरह आइना सा

ताज़ा रफ़ाक़तों के पुर-कैफ़ सिलसिलों में
रहता है दिल न जाने अब क्यूँ डरा डरा सा

मेरी बला से चाहत की लाख बारिशें हों
मैं पहले भी था प्यासा मैं आज भी हूँ प्यासा

दोनों में आज तक वो पहली सी तिश्नगी है
फिर वस्ल में नहीं क्यूँ वो लुत्फ़ इब्तिदा सा

तन्हाइयों की ज़द में रहती है रूह मेरी
इस वास्ते हूँ यारो मैं आज कल बुझा सा

टकरा गए जो उन से हम राह में अचानक
इक दास्ताँ हुई फिर वो हादसा ज़रा सा

जिस पर निगाह ठहरी जान-ए-'ख़याल' अपनी
वो अजनबी है लेकिन लगता है आश्ना सा
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Rafique Khayal
शाम थी हम थे और समुंदर था
किस क़दर दिल-फ़रेब मंज़र था

इक तरफ़ थी ख़ुशी उजालों की
इक तरफ़ शाम होने का डर था

थे परेशान तीर नज़रों के
जब तलक दिल मिरा हदफ़ पर था

वो था कमसिन ये सच सही लेकिन
हसरतों में मिरे बराबर था

दिल तो था मुतमइन रिफ़ाक़त में
ख़ौफ़ सा धड़कनों के अंदर था

अपने हाथों उसे गँवाया है
जिस में पिन्हाँ मिरा मुक़द्दर था

उस की रंगीन क़ुर्बतों के सबब
रात जन्नत-नुमा मिरा घर था

शहर-ए-जाँ की उदास गलियों में
मुश्तइ'ल ख़्वाहिशों का लश्कर था

शोर कमरे में था क़यामत का
चुप का आलम 'ख़याल' बाहर था
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Rafique Khayal
दूर तक दश्त में उजाला है
जाने किस क़हर का हवाला है

फिर उगलने लगी है आग ज़मीं
फिर कोई क़त्ल होने वाला है

शहर-ए-ख़ुश-बख़्त का मकीं हूँ मगर
गिर्द मेरे ग़मों का हाला है

दिल ने ग़म का अलाव लफ़्ज़ों में
किस महारत से आज ढाला है

जुर्म सरज़द हुआ था आदम से
मुझ को जन्नत से क्यूँ निकाला है

तेरी इक आरज़ू ने लोगों को
किस क़दर उलझनों में डाला है

इक सज़ा-याफ़्ता-ए-इश्क़ ने आज
मंसब-ए-इश्क़ फिर सँभाला है

फिर 'ख़याल'-ए-सितम-ज़दा में कोई
ख़ुश्बू-अंगेज़ मिस्ल-ए-लाला है
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Rafique Khayal
ज़िंदा हैं मिरे ख़्वाब ये कब याद है मुझ को
हाँ तर्क-ए-मोहब्बत का सबब याद है मुझ को

तफ़्सील-ए-इनायात तो अब याद नहीं है
पर पहली मुलाक़ात की शब याद है मुझ को

ख़ुश्बू की रिफ़ाक़त का नशा टूट रहा है
लेकिन वो सफ़र दाद-तलब याद है मुझ को

अब शाम के हाथों जो गिरफ़्तार है सूरज
दोपहर में था क़हर-ओ-ग़ज़ब याद है मुझ को

ऐवान मिरी रूह के रौशन किए जिस ने
वो शोख़ी-ए-यक-जुम्बिश-ए-लब याद है मुझ को

कुछ दिन से मुक़य्यद हूँ मैं वीराना-ए-जाँ में
हालाँकि कोई शहर-ए-तरब याद है मुझ को

क्यूँ याद दिलाते हो मुझे चाँदनी रातें
पैमान-ए-वफ़ा तुम से है सब याद है मुझ को

वो शख़्स 'ख़याल' आज जो रू-पोश है मुझ में
थे उस में कमालात अजब याद है मुझ को
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Rafique Khayal

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