ख़ुदा सिखाए हुनर मुझ को चापलूसी का

वगरना फ़न अता कर दे मुझे ख़मोशी का

कहाँ कमाई का है रंग देखती दुनिया
ज़माना देखता है रंग कामयाबी का

बटोर सकते हो कुछ पल की शोहरतें तुम भी
तुम्हें श'ऊर अगर आए जी हुज़ूरी का

मैं अपनी सादगी को ले के अब किधर जाऊँ
हर एक सम्त बिछा जाल चालबाज़ी का

यहाँ पे सच सदा ही तल्ख़ सब को लगता है
किसी को भाता कहाँ लहजा ख़ुश-बयानी का

बचा के मुझ को 'मलक' हादिसों से दुनिया की
जता रहा है वो एहसान मेहरबानी का

— Ram Singar Malak

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Sach Shayari

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