दिन रात अब तो ख़ुद को सजाने लगे हैं हम
या'नी किसी के ख़्वाब में आने लगे हैं हम
बर्बादियों का रोना भी रोते तो कब तलक
कल से ही जश्न-ए-हिज्र मनाने लगे हैं हम
आँखों में जो बसाई थी इक रोज़ आप की
तस्वीर आँसुओं से मिटाने लगे हैं हम
लौटे हैं जब से प्यासे ही दरिया के पास से
क़तरे से अपनी प्यास बुझाने लगे हैं हम
साज़िश हमारे क़त्ल की जब आम हो गई
साए से ख़ुद के ख़ुद को बचाने लगे हैं हम
शम्स-ओ-क़मर को रौशनी पे था बड़ा गुमाँ
शब जुगनुओं के साथ बिताने लगे हैं हम
ऐसा नहीं कि तुम ही तलबगार थे 'मलक'
ले देख तितलियों को भी भाने लगे हैं हम
— Ram Singar Malak















