न बेकार हैं आदमी सी किताबें
अँधेरे में हैं रौशनी सी किताबें
मुझे ज़ंग खाई इन अलमारियों में
हमेशा मिलीं क़ीमती सी किताबें
सुना है हज़ारों बरस तक जियेंगी
तुम्हारी मेरी दोस्ती सी किताबें
बहाकर ख़यालों को लाती सदा हैं
मुझे लग रही हैं नदी सी किताबें
ज़माने को ख़ुद में समेटे खड़ी हैं
कि लम्हा नहीं हैं सदी सी किताबें
किसी के लिए ज़िंदगी की ज़रूरत
किसी के लिए ज़िंदगी सी किताबें
— Richa Choudhary Sahar















