जानवरों से ले कर रंगों तक पर झगड़े होते हैं

लोगों की आँखों पर मज़हब के क्यूँ चश्में होते हैं

शीशा चढ़ा लिया गाड़ी का आते देख भिखारी को
बड़े बड़े लोगों के दिल भी कितने छोटे होते हैं

सब से पहले मैं उस को माँ बाबास मिलवाऊँगा
उस को लगता है के सारे लड़के झूठे होते हैं

शहरों में बिजली की मोटी तारें हर सू झूल रहीं
और गाँवों में अब भी सावन वाले झूले होते हैं

कहता है के इक दिन मैं भी रोटी खाकर सोऊँगा
इक मुफ़लिस बच्चे के सपने कितने महँगे होते हैं

बचपन से ही हम ने माँ को सब कुछ सहते देखा है
जैसी माँ होती है वैसे ही तो बच्चे होते हैं

— Richa Choudhary Sahar

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