जैसे लोबान की ही बू है ग़ज़ल

इक मुक़द्दस सी गुफ़्तगू है ग़ज़ल

जैसे दरवेश की सदा हो कोई
रूह की मिस्ल-ए-जुस्तजू है ग़ज़ल

दर्द को लफ़्ज़ों में पिरो दे जो
इक सुलगती सी आरज़ू है ग़ज़ल

लब न हिलते हों और बात भी हो
ख़ामुशी की ही हू-ब-हू है ग़ज़ल

रात भर जागने का हासिल है
मेरी पलकों की आबरू है ग़ज़ल

जिसमें हर अक्स साफ़ दिखता है
अक्स-दर-अक्स रू-ब-रू है ग़ज़ल

हिज्र की रात यूँ खुला मुझ पर
तेरी यादों की आब-जू है ग़ज़ल

देख लो तुम भी जी लगा कर अब
पाक जज़्बों से बा-वुज़ू है ग़ज़ल

अब कहाँ कोई दूसरा है यहाँ
एक मैं हूँ और एक तू है ग़ज़ल

— Saarthi Baidyanath

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