जब से कहा है कोई भी अपना नहीं मिरा
मुझ को ये दर्द छोड़ के जाता नहीं मिरा
सदमा लगा हुआ है किसी बात का इसे
दिल ये किसी भी बात पे रोता नहीं मिरा
जिस पर लगी हुई हो ज़माने की हर ख़ुशी
हँसता हुआ कभी भी वो चेहरा नहीं मिरा
मुझको वो देख देख के रोती है रात दिन
माँ कह रही है सबसे ये लड़का नहीं मिरा
दिन अब ये आ गए हैं तो कहना पड़ा मुझे
मरहम किसी भी ज़ख़्म को भरता नहीं मिरा
मैं लाख रोकता हूँ मगर छोड़ कर सभी
जाते हैं मुझको एक भी रहता नहीं मिरा
उस बेवफ़ा की आग मिरा लड़का खा गई
लड़का किसी भी हाल में मरता नहीं मिरा
उसके बग़ैर काट रहा हूँ ये ज़िंदगी
जिसके बग़ैर पल भी था कटता नहीं मिरा
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