तन्हाइयों में हैं तेरी सोहबत के बा'द से
किस काम के बचेंगे मुहब्बत के बा'द से
तू ने पलट के भी नहीं देखा मुहाजिरा
कोई नहीं है ख़ुश तेरी हिजरत के बा'द से
आमेज़िश-ए-करम है सितम तक में भी तेरे
मशहूर हो रहा हूँ मैं तोहमत के बा'द से
सूरज भी वक़्त-ए-हाजत-ए-इंसान कुछ नहीं
नज़रें नहीं ठहरती ज़रूरत के बा'द से
हम बन गए बिगड़ गए या मर गए तो क्या
क़िस्से तो जी उठे तेरी रुख़सत के बा'द से
कल तक यहाँ पे कोई हमें जानता न था
नज़रों में आ गए हैं बग़ावत के बा'द से
— Shadab Javed















