दरियारुकाहुआथामगरमैंसफ़रमेंथा
इकरौशनीकाअक्सभीमेरेहुनरमेंथा
ओढ़ाहुआथासचकालबादावजूदने
लेकिनशुऊ'रझूटकेअंधेनगरमेंथा
हररास्तेकीधूलपरोंमेंसमेटकर
अंजानमंज़िलोंकापरिंदासफ़रमेंथा
बाज़ारमेंथीहँसतेचराग़ोंकीरौशनी
बुझतेहुएदिएकाधुआँमेरेघरमेंथा
कंदाथाख़्वाहिशोंकाफ़सानाफ़सीलपर
ज़िंदाहक़ीक़तोंकालहूइकखंडरमेंथा
उतरीथीरातशहरमेंआँसूलिएहुए
इकक़ाफ़िलासहरकाकहींरहगुज़ारमेंथा
'ताहिर'मिरेवजूदकीबोलीतोदेगया
शायदवोअपनीज़ातकेनीलाम-घरमेंथा