तुम हिन्दू न मुसलमाँ समझो
इंसाँ को बस इंसाँ समझो
मिट्टी को वो माँ कहते थे
इस मिट्टी को बस माँ समझो
तुम समझो मुझ को जो हूँ मैं
क्यूँ दुश्मन जान-ए-जाँ समझो
ढूँढो कोई नक़्श मिरा भी
कुछ तो मेरे अरमाँ समझो
जो इनकार नहीं करता है
इस को उस की तुम हाँ समझो
गर न अभी तक तुम हो समझे
फिर तुम ख़ुद को नादाँ समझो
ग़ज़लें लिखना मुश्किल 'सलमा'
काम नहीं ये आसाँ समझो
— Salma Malik















