अगर ज़ाहिद तू महफ़िल में हमारी एक बार आए
उसी जानिब को फिर उठें क़दम बे-इख़्तियार आए
जो आए मय-कदे से बे-ख़ुद-ओ-मस्ताना-वार आए
कहीं ऐसा न हो बा-होश कोई बादा-ख़्वार आए
दिल-ओ-ईमाँ-ओ-दीं होश-ओ-ख़िरद कुछ भी नहीं बाक़ी
किसी की हम निगाह-ए-नाज़ का सदक़ा उतार आए
पिलाई आज मयख़ाने में नज़रों से शराब ऐसी
दु'आ देते हुए साक़ी को सारे बादा-ख़्वार आए
सितम सह सह के काटी उम्र सारी उफ़ न की हम ने
वफ़ाओं का मिरी ऐ काश उन को ए'तिबार आए
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