तिरी रफ़्तार पर क़ुर्बान जाऊँ ऐ तरक़्क़ी
मैं अपने अहद में गुज़रा ज़माना हो गया हूँ
मेरे अतराफ़ रहता है हुजूम-ए-ना-मुरादी
जबीन-ए-ना-रसा में आस्ताना हो गया हूँ
हवा की तान पर गाते हैं मुझ को ख़ुश्क पत्ते
मैं हर टूटे हुए दिल का तराना हो गया हूँ
मिरी मिट्टी में अब मेरी हक़ीक़त ढूँढती है
मैं दुनिया के लिए जब से फ़साना हो गया हूँ
मिरा भी तज़्किरा होने लगा दानिशवरों में
तो क्या फिर मैं भी 'आज़िम' कुछ दिवाना हो गया हूँ
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हर कस-ओ-ना-कस को रास आती नहीं आवारागर्दी
रास्ते उस पर ही खुलते हैं जो चलना जानता है
नक़्श-ए-पारीना हटा कर मैं नए पैकर तराशूँ
कूज़ा-गर कंकर हटा कर जैसे मिट्टी सानता है
वो है दीवाना उसे गुमनामी ओ तश्हीर से क्या
ख़ामुशी से कर गुज़रता है जो दिल में ढानता है
कोर-चश्मी ने बिखेरा हुस्न का शीराज़ा वर्ना
इश्तिहारी जिस्म भी पोशीदगी को मानता है
ये सिला भी कम नहीं 'आज़िम' तिरी मश्क़-ए-सुख़न का
कोई ग़ज़लों के हवाले से तुझे पहचानता है
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छुपा रही है ख़द-ओ-ख़ाल झुर्रियाँ बन कर
जमी हुई थी सफ़र में जो गर्द चेहरे पर
कमाल-ए-ज़ब्त तो ये है कि रंग-ए-मायूसी
दम-ए-शिकस्त भी झलके न मर्द-चेहरे पर
पिघलती क्यूँ न भला बर्फ़ अज्नबिय्यत की
नज़र की धूप जो ठहरी थी सर्द चेहरे पर
मैं धूल अहल-ए-चमन मेरी क़द्र क्या जानें
मुझे सजाते हैं सहरा-नवर्द चेहरे पर
हर एक जिस्म बरहना लगे वहाँ 'आज़िम'
जहाँ नक़ाब रखे फ़र्द फ़र्द चेहरे पर
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मैं ने जब हद से गुज़रने का इरादा कर लिया
मंज़िल-ए-दुश्वार को तय पा-पियादा कर लिया
मंज़िल-ए-दुश्वार को तय पा-पियादा कर लिया
बे-हक़ीक़त हो गए मेरी नज़र में मेहर-ओ-माह
मैं ने जब घर के दिए से इस्तिफ़ादा कर लिया
आँसुओं ने ग़म को उर्यां कर दिया होता मगर
दिल की ग़ैरत ने तबस्सुम को लबादा कर लिया
अम्न की सब शाहराहें तंग हो कर रह गईं
हादसों ने रास्ता कितना कुशादा कर लिया
उम्र भर 'आज़िम' रहेगा नश्शा-ए-ग़म का ख़ुमार
आँख को पैमाना-ए-ख़ूँ दिल को बादा कर लिया
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शहर वालो जान लेना गाँव मेरा आ गया
बच्चियों के सर पे जब आँचल नज़र आने लगे
हम ने माँगी भी दुआ-ए-अब्र-ए-रहमत किस घड़ी
जब सरों पर ज़ुल्म के बादल नज़र आने लगे
आइने पर आज के जमने न दे माज़ी की धूल
ताकि तेरा आने वाला कल नज़र आने लगे
हम वहाँ तक भी न पहुँचे जिस बुलंदी से गिरे
जब कि पिछड़े लोग भी अव्वल नज़र आने लगे
लोग तो कहते थे 'आज़िम' ये कभी फलती नहीं
ज़ुल्म की टहनी पे कैसे फल नज़र आने लगे
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हर बड़े नाम को छोटों से जिला मिलती है
शहर की हाशिया-आराई मज़ाफ़ात करें
लाज वीरानी की रखनी है चलो अहल-ए-जुनूँ
आबला-पाई से आबाद ख़राबात करें
खेत सूखे तो हवा फिर से सनक जाएगी
आप बादल हैं तो दावा नहीं बरसात करें
गुलनवाज़ो हमें काँटों ने नवाज़ा है बहुत
हम पे वाजिब है कि ज़ख़्मों की मुदारात करें
ऐश-ए-आवारगी क्या क्या थे तिरी गलियों में
सोच की परियाँ वहीं अब गुज़र औक़ात करें
मैं अगर ज़िक्र भी उस का न करूँ शे'रों में
इस्तिआ'रात अलामात इशारात करें
मत्न को हुस्न के एराब अता हम ने किए
हम से तशरीह तलब जिस्म की आयात करें
ग़ैर महरम से बचा अपनी ग़ज़ल को 'आज़िम'
छेड़ख़्वानी न कहीं मौलवी हज़रात करें
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तुम्हारे बिन अब के जान-ए-जाँ मैं ने ईद करने की ठान ली है
ग़मों के एक एक पल से ख़ुशियाँ कशीद करने की ठान ली है
ग़मों के एक एक पल से ख़ुशियाँ कशीद करने की ठान ली है
मैं उस की बातों का ज़हर अपनी ख़मोशियों में उतार लूँगा
अगर मुज़िर है तो मैं ने उस को मुफ़ीद करने की ठान ली है
तलाश की शिद्दतों ने अर्ज़-ओ-समा की सब दूरियाँ मिटा दीं
सो मैं ने अब तेरी जुस्तुजू को शदीद करने की ठान ली है
मशीन बोना है जिन का पेशा उन्हें ज़मीं बेच दी है तुम ने
किसान हो कर ख़ुद अपनी मिट्टी पलीद करने की ठान ली है
ये मेरी तहज़ीब का असासा ही मेरी पहचान बन सकेगा
तमाम कोहना रिवायतों को जदीद करने की ठान ली है
स्याह शब का ग़नीम शायद कि आ गया रौशनी की ज़द में
सभी चराग़ों को जिस ने 'आज़िम' शहीद करने की ठान ली है
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दर्द तेरा मिरे सीने से निकाला न गया
इक मुहाजिर को मदीने से निकाला न गया
इक मुहाजिर को मदीने से निकाला न गया
मैं तिरे साथ गुज़ारे हुए दिन जीता रहा
एक पल भी तुझे जीने से निकाला न गया
एक मोती भी न उभरा मिरी आँखों में कभी
तेरे बिन कुछ भी दफ़ीने से निकाला न गया
जब निकाला है मुझे दिल से तो रोते क्यूँ हो
तुम से काँटा भी क़रीने से निकाला न गया
लुक़्मा-ए-तर न मिलेगा तिरे नाज़ुक तन को
गर मिरे ख़ून पसीने से निकाला न गया
मैं ने माँगा था बस इक धूप का टुकड़ा 'आज़िम'
वो भी सावन के महीने से निकाला न गया
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जो मैं ने कह दिया उस से मुकरने वाला नहीं
कि आसमान ज़मीं पर उतरने वाला नहीं
कि आसमान ज़मीं पर उतरने वाला नहीं
मैं रेज़ा रेज़ा हूँ लेकिन नमी अभी तक है
हवाएँ लाख चलें मैं बिखरने वाला नहीं
मैं जानता हूँ वो अच्छे दिनों का साथी है
बुरे दिनों में इधर से गुज़रने वाला नहीं
हमारे शहर में चेहरा नहीं रहा शायद
पड़े हैं आइना-ख़ाने सँवरने वाला नहीं
तिरे करम का सज़ा-वार मैं हूँ या दिल है
दिया है तू ने वो कासा जो भरने वाला नहीं
कहाँ का ख़्वाब मुसाफ़िर की आँख में 'आज़िम'
कि बहते पानी में मंज़र ठहरने वाला नहीं
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क्या करूँ ज़र्फ़-ए-शनासाई को
मैं तरस जाता हूँ तन्हाई को
मैं तरस जाता हूँ तन्हाई को
ख़ामुशी ज़ोर-ए-बयाँ होती है
रास्ता दीजिए गोयाई को
तेरे जल्वों की फ़रावानी है
और क्या चाहिए बीनाई को
उन की हर बात बहुत मीठी है
मुँह लगाते नहीं सच्चाई को
ऐ समुंदर मैं क़तील-ए-ग़म हूँ
जानता हूँ तिरी गहराई को
बैठा रहता हूँ अकेला यूँही
याद कर के तिरी यकताई को
खींच ले जाते हैं कुछ दीवाने
अपनी जानिब तिरे सौदाई को
उफ़ तमाशा-गह-ए-दुनिया 'आज़िम'
कितनी फ़ुर्सत है तमाशाई को
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