वो जो तुम ने ग़म दिया था मुझे साज़गार होता
अगर इतना और होता कि वो उस्तुवार होता
अगर इतना और होता कि वो उस्तुवार होता
तिरी बे-रुख़ी के सदक़े मुझे आ गया है जीना
न तो रूठता न ज़ालिम मुझे ग़म से प्यार होता
शब-ओ-रोज़ के नज़ारे ये करिश्में रंग-ओ-बू के
ये तिलिस्म तोड़ देता अगर इख़्तियार होता
उसे वक़्फ़-ए-ख़ाक कर के किया ख़ूब तू ने वर्ना
ये वो ज़र्रा था कि उठता तो फ़लक पे बार होता
कभी एक बार भी तो मिरा तज़्किरा चमन में
ब-ज़बान-ए-गुल न होता ब-ज़बान-ए-ख़ार होता
लो सुनो कि अब ज़माना तुम्हें कह रहा है क्या कुछ
यही मैं जो अर्ज़ करता तुम्हें नागवार होता
मिरे पास-ए-ज़ब्त-ए-ग़म को न हुआ पसंद वर्ना
न मुझे क़रार होता न तुम्हें क़रार होता
अरे 'नूर' कौन सुनता तिरा उज़्र-ए-बे-गुनाही
तू गुनाह भी न करता तो गुनाहगार होता
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बग़ैर वज्ह ये साक़ी की बे-रुख़ी तो नहीं
मैं सोचता हूँ कहीं कुछ ख़ता हुई तो नहीं
मैं मुतमइन हूँ मगर सिर्फ़ ये बता दीजे
ये ग़म जो आप ने बख़्शा है आरज़ी तो नहीं
सभी के दिल में मोहब्बत की आग होती है
सभी को रास भी आए ये लाज़मी तो नहीं
अजल का चेहरा नज़र आए कुछ बंधे ढारस
रह-ए-हयात में इतनी भी रौशनी तो नहीं
तसव्वुरात में कुछ देर खो तो जाता हूँ
मगर अब इन में भी अगली सी दिलकशी तो नहीं
चमन वही है बहारें वही हैं गुल भी वही
मगर गुलों में वो ख़ुशबू वो ताज़गी तो नहीं
हर एक चीज़ नज़र आती है उदास उदास
कहीं ये मेरे ही एहसास की कमी तो नहीं
ये सारे रंज ब-क़ैद-ए-हयात ही तो नहीं
हयात मेरी कोई उम्र ख़िज़र की तो नहीं
किसी पे बरसे कोई बूँद बूँद को तरसे
ये और जो भी हो साक़ी की मुंसिफ़ी तो नहीं
कभी जो 'नूर' कोई रिश्ता-ए-वफ़ा टूटे
ये देख लेना कि आँखों में कुछ नमी तो नहीं
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उन्हीं से रूह को फ़रहत उन्हीं से दिल को क़रार
वो हादसात जिन्हें जाँ-सिताँ कहा जाए
इसी में चंद मोहब्बत के दिन भी शामिल हैं
तमाम उम्र को क्यूँ राएगाँ कहा जाए
मिरे नसीब में लिखे न जा सके तुम से
वो चार तिनके जिन्हें आशियाँ कहा जाए
मिरे हुजूम-ए-तमन्ना की आख़िरी मंज़िल
बस एक मर्ग जिसे ना-गहाँ कहा जाए
अदा-ए-तमकनत-ए-हुस्न का तक़ाज़ा है
हर इक सितम पे उन्हें मेहरबाँ कहा जाए
हर एक क़तरे में सौ सौ हिकायतें होंगी
हज़ार दीदा-ए-तर बे-ज़बाँ कहा जाए
हरीम-ए-दिल में कहीं रह गई ख़लिश बन कर
किसी की याद जिसे नीश-ए-जाँ कहा जाए
हमारे अश्क ही जब 'नूर' रख सके न भरम
फिर और किस को भला राज़दाँ कहा जाए
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कुछ नहीं होता ब-जुज़ हुक्म-ए-ख़ुदा
आदमी तो मुफ़्त में बदनाम है
अब ख़ुदा बख़्शे न बख़्शे क्या करूँ
दिल तो मेरा बंदा-ए-असनाम है
देखिए चलिए नज़ारे राह के
ये सफ़र बस और दो इक गाम है
हम-नशीनो अब तो मेरे वास्ते
ज़िंदगी टूटा हुआ इक जाम है
दर्द भी कुछ दब गया है दिल के साथ
'नूर' इस करवट बहुत आराम है
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उस शम्अ'' पे जलने को तड़पते हैं पतंगे
जिस शम्अ'' को आँखों से फ़रोज़ाँ नहीं देखा
रक़्साँ है यहाँ नूर-ब-कफ़ जल्वा-ए-जानाँ
क्या तू ने अभी दीदा-ए-हैराँ नहीं देखा
होने को तो था 'नूर' के दिल में भी बड़ा दर्द
लेकिन कभी चेहरे से नुमायाँ नहीं देखा
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जज़्बा-ए-इश्क़ अगर दिल में न पैदा होता
मैं समझता हूँ मिरे हक़ में ये अच्छा होता
मैं समझता हूँ मिरे हक़ में ये अच्छा होता
इस क़दर शिद्दत-ए-ग़म पर तो यही लाज़िम था
दिल न होता मिरा पत्थर का कलेजा होता
बे-ख़ुदी है कि तिरी बज़्म में ले आई है
होश होता तो यहाँ किस लिए रुस्वा होता
इक नज़र देख के कुछ और बढ़ा दी वहशत
इस से अच्छा तो यही था कि न देखा होता
मुझ को मंज़ूर न थी अपनी ही शोहरत वर्ना
मैं तो वो था कि मिरा अर्श पे चर्चा होता
ज़ीस्त भी मौत भी दोनों के तुम्हीं हो मालिक
मुंसिफ़ी ये थी कि हक़ एक पे मेरा होता
कुछ हक़ीक़त न सही हुस्न-ए-अक़ीदत ही सही
'नूर' जीने के लिए कुछ तो सहारा होता
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मैं ने सोचा ही नहीं मर के किधर जाऊँगा
मैं तो मानिंद-ए-सबा याँ से गुज़र जाऊँगा
मैं तो मानिंद-ए-सबा याँ से गुज़र जाऊँगा
सैर-ए-गुलशन का ये अंजाम कहाँ सोचा था
ले के इस बज़्म से इक ज़ख़्म-ए-जिगर जाऊँगा
जब से मानूस तिरे ग़म से हुआ हूँ ऐ दोस्त
ऐसा लगता है कि हर ग़म से गुज़र जाऊँगा
हुस्न की आँच न दो इश्क़ ज़दा दिल को मिरे
नक़्श-ए-पोशीदा की मानिंद उभर जाऊँगा
ये न भूलें मिरी हस्ती को मिटाने वाले
मेरी फ़ितरत है सँवरना मैं सँवर जाऊँगा
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अदू के हाथ से मैं जाम ले कर पी नहीं सकता
किसी कम-ज़र्फ़ का एहसान ले कर जी नहीं सकता
किसी कम-ज़र्फ़ का एहसान ले कर जी नहीं सकता
कभी जी चाहता है नाम ले कर ज़ोर से चीख़ूँ
न जाने नाम क्यूँ ज़ालिम का फिर ले भी नहीं सकता
मिरे दिल ने ज़माने में कुछ इतने ज़ख़्म खाए हैं
मसीहा भी दिल-ए-सद-चाक को अब सी नहीं सकता
मिरी तिश्ना-लबी पर 'नूर' ये भी तंज़-ए-साक़ी है
भरे हैं हर तरफ़ जाम-ओ-सुबू और पी नहीं सकता
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मोहब्बत जो कभी आराम-जाँ थी
वही अब नीश-ए-जाँ है और मैं हूँ
ये जल्वों की फ़रावानी का आलम
निगाह-ए-बे-ज़बाँ है और मैं हूँ
मिरा अफ़्साना अब मेरा नहीं है
हदीस-ए-दीगराँ है और मैं हूँ
हूँ महव-ए-हुस्न-ए-पोशीदा पस-ए-गुल
बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ है और मैं हूँ
ख़िरद मेरे जुनूँ पर हँस रही है
तलाश-ए-बे-निशाँ है और मैं हूँ
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ग़ज़ल कही है हदीस-ए-ग़म-ए-जहाँ की तरह
सुनेंगे लोग इसे अपनी दास्ताँ की तरह
सुनेंगे लोग इसे अपनी दास्ताँ की तरह
फ़रेब देता हूँ दुनिया को इंकिसारी का
मैं अपने आप में फैला हूँ आसमाँ की तरह
क़दम क़दम पे ज़िया-बारियाँ मआ'ज़-अल्लाह
ये रहगुज़र है कि फैली है कहकशाँ की तरह
ये गुल तो गुल हैं चमन को न बेच दें ज़ालिम
जो रूप अपना बनाए हैं बाग़बाँ की तरह
ज़रूर साज़िश-ए-कलक-ए-अज़ल थी कुछ इस में
पड़ा हूँ एक तरफ़ हर्फ़-ए-राएगाँ की तरह
कहाँ था मेरा नशेमन मैं सब से पूछ आया
किसी का घर न जले मेरे आशियाँ की तरह
टटोल लेना ज़रा उन की आस्तीनें भी
जो तुम से हाथ मिलाते हैं राज़-दाँ की तरह
वो जिन का राज़-ए-मोहब्बत था बे-नियाज़ हुए
हम उन का राज़ छुपाए हैं अपनी जाँ की तरह
कोई तो जान पे खेले है बन के परवाना
जला करे है कोई शम्अ-ए-बे-ज़बाँ की तरह
मिले तो क़ाफ़िले सौ सौ शिकस्ता-पा थे हमीं
उठ उठ के बैठ गए गर्द-ए-कारवाँ की तरह
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