निकल पड़ा हूँ मैं बेकार राह-ए-उल्फ़त में
मुझे पुकारते हैं ख़ार राह-ए-उल्फ़त में
वो लूट ही तो रहा है हमें मोहब्बत से
कोई नहीं है वफ़ादार राह-ए-उल्फ़त में
जहान भर को फ़क़त जिस्म से मोहब्बत है
सभी यहाँ हैं गुनहगार राह-ए-उल्फ़त में
कभी किया ही नहीं प्यार मैं ने फिर कैसे
करूँ क़ुबूल अभी हार राह-ए-उल्फ़त में
कभी कभी मेरे आँखों में प्यार आता है
मैं इस क़दर हूँ अदाकार राह-ए-उल्फ़त में
मिरा सुकून मिरा चैन तब से खोया है
हुआ हूँ जब से गिरफ़्तार राह-ए-उल्फ़त में
— Yashvardhan Mishra 'Hind'















