"वीराने खंडर"

चलते-फिरते खंडर हैं हम सब
कुछ यादों के धुंधले फ़्रेम
इस
में टिकाए चलते हैं
इस की जर्जर दीवारों में
कुछ मुश्किल सवाल उलझाए चलते हैं

कभी इस की चार-दीवारी में
आज़माती सी सर्द रातों में
जुनून के अलाव जलाए चलते हैं

इस के आँगन में एक कुआँ होता है
जिस के अंदर आशाओं का
ग़मों का सैलाब लिए चलते हैं
तह में उस की कुछ राज़ हम
कुछ गहरी बातें अपनी छिपाए चलते हैं
इन बातों की चीख़ अक्सर ऊपर आते-आते
दब जाती है ख़ालीपन में घुल जाती है
इस
में से कभी मद्धम उल्फ़त की ख़ुशबू
तो कभी नफ़रत की बू आती है

ऐसा नहीं कि बस अँधेर हैं इन के दामन में
वहाँ कुछ उजले दिन भी मुयस्सर हैं
ये खोखले अकेले खंडर रौशन भी होते हैं
किसी की आहट-गर्माहट से महकते भी हैं
जाने-अनजाने मुसाफ़िर मरम्मत करवा के
कुछ दिन इन
में बसर भी करते हैं
कभी ख़ुशियों की चिड़िया भी चहकती है गुनगुनाती है
इन
में कभी दोस्ती की हरियाली भी दस्तक देती है
कभी पहले प्यार वाली गिलहरी भी शिरकत करती है

पर ये सब निहायती मूडी और बंजारे मेहमान हैं सारे
टिकते नहीं कमबख़्त
टिकती है तो बस गुटर-गूँ
कुछ आफ़तों वाले कबूतरों की
जैसे ब-मुश्किल बची दीवटें इस
में
बाट जोहती हैं सदा किसी की।

खुली खिड़कियाँ दरवाज़े आते-जाते मौसम को
दूर से तकते तो कभी पास बुलाते हैं
फ़िक्रों के टूटे अरमानों के तेज़ झोंके
सीलन भरी पलस्तर इस की गिराते हैं
आसपास के खंडर जब ज़मीं में धँसे जाते हैं
शोक के भूकंप तब इस की नींव हिलाते हैं

गुज़रते वक़्त के साथ हम और खंडर हुए जाते हैं
किसी के छू के चले जाने से कुछ और ज़्यादा
ख़ामोश धूल मिट्टी ही तो नसीब है हमारा
कभी देखा है इन खंडरों की सफ़ाई होते

— kapil verma

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