नहीं सुनता वो अब बातें मेरी चाहे कहो कुछ भी

जो जी करता है करता है वही चाहे कहो कुछ भी

मेरी नादानियों पर आज मुझ को है बड़ा अफसोस
ग़लत था मैं यही है बस सही चाहे कहो कुछ भी

अगर वो चाहती तो प्यार से समझा भी सकती थी
मगर उस ने नहीं चाहा कभी चाहे कहो कुछ भी

हमारे दरमियाँ सुलझा हुआ था सब मगर फिर भी
बहुत उलझी हुई थी ज़िंदगी चाहे कहो कुछ भी

अगर वो दोस्त थी तो छोड़कर के क्यूँ गई ऐसे
उसे मुझ से मुहब्बत तो थी ही चाहे कहो कुछ भी

मैं अरसे बा'द जब उस से मिला तो मैं ने ये पाया
मिलन में भी किसी की थी कमी चाहे कहो कुछ भी

बग़ावत की सज़ा मिलनी ही है 'आवर्त' धड़कन से
क़ज़ा ही है फ़क़त सच आख़िरी चाहे कहो कुछ भी

— Ayush Aavart

More by Ayush Aavart

Other ghazal from the same pen

See all from Ayush Aavart →

Sazaa Shayari

Shers of sazaa.

All Sazaa Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling