मेरे अंदर कोई आतिश-ब-जाँ बैठा
जहाँ ख़ुद घुट के मर जाए वहाँ बैठा
ख़ता कोई नहीं फिर क्यूँ जहाँ में मैं
हक़ारत से गया देखा जहाँ बैठा
किसी ने हार कर नस काट ली अपनी
किसी के फेफड़ों में जा धुआँ बैठा
वो जैसे लोगों के दिल बैठ जाते हैं
कुछ ऐसे वो हमारे दरमियाँ बैठा
लगी बस इस लिए ख़ामोशी की आदत
मैं जिस महफ़िल में बैठा बे-ज़बाँ बैठा
जो था सो था तो अब अफसोस ये कैसा
बिछड़ कर तुम से क्या मतलब कहाँ बैठा
— Ayush Aavart















