ये तमाशा है और कुछ भी नइँ
जीने मरने का तौर कुछ भी नइँ
जो भी बोया है क्या बरत लेगा
ये मुनाफ़ा अगौर कुछ भी नइँ
वक़्त पर हिज्र मिल गया वरना
था मोहब्बत का दौर कुछ भी नइँ
पहले मायूस तो हो जाती थी
अब निगाहों पे जौर कुछ भी नइँ
उन की सुनते रहो जो कहते हैं
अब सुनाने को और कुछ भी नइँ
— Chetan















