आप की याद से कुछ ऐसे जुदा होना पड़ा
ख़ाक में मिल के मुझे ख़ुद ही फ़ना होना पड़ा
सोज़न ओ ख़ार चुभन नकहत-ए-गुल बाद-ए-सबा
देख ले मुझ को तिरे इश्क़ में क्या होना पड़ा
एक लम्हे को गुज़रने में भी इक अर्सा लगा
जब किसी क़ैस को लैला से जुदा होना पड़ा
जब ख़िज़ाओं में बहारों की तलब हम से हुई
दर्द-ए-दिल को वहाँ कुछ और सिवा होना पड़ा
मुनकिरों पर जो कभी टूट पड़ा कोई अज़ाब
फिर उन्हें भी तो परस्तार-ए-ख़ुदा होना पड़ा
ज़ख़्म दिल का भी रहे उस का मुदावा भी हुए
मुझ मरीज़-ए-जाँ को ख़ुद अपनी दवा होना पड़ा
खिदमत-ए-दीं के लिए चुन लिया अल्लाह ने जब
कर्बला वालों को यसरिब से जुदा होना पड़ा
फ़ैज़ जब संग तराशी पे हुआ आमादा
एक पत्थर को भी फिर बेश-बहा होना पड़ा















