हम ने बरसों तलक संभाले हैं

ग़म ज़माने के देखे भाले हैं

तू मिरे वास्ते मसीहा है
दर्द मेरे तेरे हवाले हैं

काम किस के भला वो आएँगे
सिक्के दरिया में जो उछाले हैं

ये अदाएँ तेरी तेरे अंदाज़
कितने दिलकश हैं भोले भाले हैं

अश्क आँखों से बह न जाएँ कहीं
मैं ने पलकों में ही संभाले हैं

जिस्म उस का छुआ है जिस दिन से
मेरे हाथों पे उभरे छाले हैं

फ़ैज़ अश'आर तेरे क्या कहने
कितने सादा हैं पर निराले हैं

फ़ैज़ अश'आर क्यूँ न बेहतर हों
फ़िक्र में डूब कर निकाले हैं

— Dard Faiz Khan

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Badan Shayari

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