पता कीजे कि ऐसा क्या हुआ है
ज़माने से वो क्यूँ रूठा हुआ है
अचानक जो मिला था राह चलते
वो मेरे ज़ेहन पर छाया हुआ है
अदालत फ़ैसला करती है सच्चा
हमारा सच मगर झूठा हुआ है
तुम्हें चट्टान सा दिखता है लेकिन
वो शीशे की तरह टूटा हुआ है
हुआ तो कर्बला में ज़ेर-ए-ख़ंजर
मगर सजदा वही सजदा हुआ है
सितारों का बिखरना देखते हो
मगर ये कुल जहाँ बिखरा हुआ है
उजाला हो गया आँखों से ओझल
अँधेरा दूर तक ऐसा हुआ है
जो अपने आप को समझा था सब कुछ
सर ए बाज़ार वो रुसवा हुआ है
सनम को ख़्वाब में देखा जो मैं ने
सो मुद्दत बा'द अब सोना हुआ है
ज़रा सा मुस्कुरा कर देखना था
मगर ये फ़ैज़ क्या समझा हुआ है
— Dard Faiz Khan















