तोहमतें सारी भूल जाता मैं
तू जो कहता तो लौट आता मैं
बोझ दिल का मेरे ही काफ़ी था
दूसरा बोझ क्या उठाता मैं
जीत कर भी जो तू नहीं मिलता
इस से बेहतर था हार जाता मैं
उस की हालत भी मेरे जैसी थी
किस तरह उस को चुप कराता मैं
हिज्र का मन बना लिया ही जब
चाहे जितने सबूत लाता मैं
सबने पूछा कि क्यूँ अकेले हो
बोल यारा कि क्या बताता मैं
तू नहीं था तो ख़ुद-कुशी ही सही
वरना तुझ को गले लगाता मैं
तू जो मय्यत पे भी चला आता
उठके अर्थी से बैठ जाता मैं
— Pushpendra Mishra















