ख़मोशी लफ़्ज़ पर भारी नया तर्ज़ ए बयाँ अपना
पराए मुल्क में अब ढूँढ़ता हूँ, हम ज़बाँ अपना
ये दुनिया है, तमाशा है, नहीं कुछ भी यहाँ अपना
न कोई राज़दाँ अपना न कोई मह्रबाँ अपना
मुहब्बत ला मकाँ लोगों को ऐसा घर बना देगी
हर इक ज़र्रे में उन को फिर देखेगा आशियाँ अपना
गुज़रती है इसी उम्मीद पर इंसान की राहें
कहीं पर तो ज़मीं अपनी कहीं पर आसमाँ अपना
न मंज़िल है,न रस्ता है,न साथी है, न कुछ आराम
अज़ल से ता अबद चलता रहेगा कारवाँ अपना
— Jaymin Joshi Mauj















