दिल के दरवाज़े पे पहरेदार कैसा
चाहने वालों से ये व्यवहार कैसा
इक नज़र में दिल मिरा घाइल हुआ है
उस की आँखों में छुपा हथियार कैसा
जो निभानी पड़ रही मजबूरियों में
सोचता हूँ मैं भी ये किरदार कैसा
भूख की ख़ातिर जो फिरता दर बदर है
वो कभी समझा कहाँ त्यौहार कैसा
इश्क़ के अंजाम से मैं डर रहा हूँ
कर रहा 'रंजन' ये कारोबार कैसा
— Ranjan Kumar Barnwal















