अब कहाँ मिलना मिलाना हो रहा है
अब न उन गलियों में जाना हो रहा है
आँख से दीदार करना था मगर अब
आँख से आँसू बहाना हो रहा है
जो कभी मेरा दिवाना था बहुत वो
ग़ैर का देखो दिवाना हो रहा है
फूल ताज़ा है महीनों बा'द भी पर
इश्क़ लगता है पुराना हो रहा है
आँसुओं को कब तलक पीता रहूँ सो
मय-कदों में रोज़ जाना हो रहा है
— Ravi 'VEER'















