शाख़-ए-दिल देखिए फिर हरी हो गई
आज ख़त्म उस की नाराज़गी हो गई
एक जंगल के बा'द एक जंगल मिला
इक मुसीबत के बा'द इक खड़ी हो गई
सब से मिलते हुए हाथ उन से मिला
हाथ के साथ कुछ बात भी हो गई
उस के होंठों से प्यासा पलटना पड़ा
ख़त्म दरिया की दरिया-दिली हो गई
चाँदनी के नगर से निकाला गया
जुगनुओं से मेरी दोस्ती हो गई
एक दिन नब्ज़ ने कुछ इशारा किया
ख़ुद-ब-ख़ुद बंद मेरी घड़ी हो गई
आ गया था हमारे तख़य्युल में वो
बंद की आँखें तो रौशनी हो गई
ढल गए ग़म सभी शा'इरी में मेरे
जितनी कालख थी सब रौशनी हो गई
— Rehan Mirza















