कैसी उल्फ़त बन गई ये कैसी आदत बन गई
मेरी अच्छी दोस्त ही मेरी मुहब्बत बन गई
आज कल मेरी ग़ज़ल में ज़िक्र उस का होता है
आज कल मेरी ग़ज़ल भी ख़ूब-सूरत बन गई
फिर मुहब्बत फिर मुहब्बत फिर मुहब्बत ही तो की
ये मुहब्बत ही 'शुभम' तेरी मुसीबत बन गई
— Shubham Vaishnav















