वो कभी बाहर कभी अंदर मकाँ को देखता है
भूख लगती है कि बच्चा अपनी माँ को देखता है
मान जन्नत की हक़ीक़त जान ली उस ने ज़मीं पर
शख़्स जो माँ-बाप में सारे जहाँ को देखता है
मुफ़लिसी की डोर से बंधा हुआ बच्चा करे क्या
दूर से ही वो खिलौनों की दुकाँ को देखता है
चाँद-तारों की कहानी सुनता दादी से रहा जो
जब भी दादी याद आती आसमाँ को देखता है
— Shubham Vaishnav















