न रस्ता है न कोई घर यहाँ पे
मुझे छोड़ा तो छोड़ा है कहाँ पे
क़सम कितनी मैं देता और वादे
सभी कुछ बे-असर था हम-रहाँ पे
बिछड़ते वक़्त उस ने ये कहा था
मिलेंगे हम तुझे अब दो-जहाँ पे
ग़ज़ल की सूरतें ही और होतीं
अगरचे आज वो होता यहाँ पे
— Subodh Sharma "Subh"















