इक जुर्म तक नहीं था हवाले पड़े रहे
ता-ज़िंदगी ही जान के लाले पड़े रहे
आता है काम कब ये सिखाया हुआ सबक़
सब सीख के भी हाथ पे छाले पड़े रहे
क्या इस लिए ये उम्र कटी है ज़'ईफ़ की
गाँवों से दूर उस के उजाले पड़े रहे
— Subodh Sharma "Subh"
ता-ज़िंदगी ही जान के लाले पड़े रहे
आता है काम कब ये सिखाया हुआ सबक़
सब सीख के भी हाथ पे छाले पड़े रहे
क्या इस लिए ये उम्र कटी है ज़'ईफ़ की
गाँवों से दूर उस के उजाले पड़े रहे
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